मुसलमानों के कितने करीब थे राष्ट्रपिता ?

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कुरबान अली

यूं तो मौजूदा दौर में पूरी दुनिया को, हिंदुस्तान को आज महात्मा गांधी की इतनी शिद्दत से जरूरत है, जितनी शायद उनकी जिंदगी में भी नहीं थी. मगर उससे भी कहीं ज्यादा महात्मा गांधी और उनकी विचारधारा की जरूरत इस वक्त हिंदुस्तान के मुसलमानों को है. आखिर इसकी वजह क्या है ? आइए, पहले जानते हैं, महात्मा गांधी का नजरिया जिसे गांधीवाद कहा जाता है क्या है ?

महात्मा गांधी उस ‘आईडिया ऑफ इंडिया‘ की बात करते हैं जो पिछले एक हजार वर्षों में पैदा हुआ. जिसे ‘हिन्दुस्तानियत‘ के नाम से जाना जाता है. जिसके तहत यहां आकर यहीं बस जाने वाला और फिर कहीं न जाने वाला हर व्यक्ति हिंदुस्तानी है.

महात्मा गांधी ने कहा था कि भारत किसी एक धर्म, जाति, संप्रदाय,वर्ण, लिंग, या भाषा विशेष वालों का देश नहीं हो सकता. यहां के हर नागरिक के अधिकार बराबर होंगे और उस पर किसी का वर्चस्व नहीं हो सकता. वह किसी अन्य के रहमो करम पर या दया की भीख पर नहीं रहेगा.

इसलिए 1857 में शुरू हुए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व जब 1920 से गांधी जी ने शुरू किया तो हिंदुओं के मुकाबले वह मुसलमानों के समर्थन मैं खड़े ज्यादा नजर आए. 1920 के अपने असहयोग आंदोलन से पहले 1919 में उन्होंने उस ‘खिलाफत आंदोलन‘ का जोरदार समर्थन किया जिसे उनके सहयोगियों मौलाना मुहम्मद अली, शौकत अली, मुख्तार अहमद अंसारी, हकीम अजमल खां, मौलाना अब्दुल बारी और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने शुरू किया था और जो भारतीय इतिहास की एक बड़ी घटना है.

1920 से लेकर 1947 तक जब स्वतंत्रता आंदोलन पूरे जोरों पर था. महात्मा गांधी ने न तो ‘हिंदुत्व‘ के पैरोकार वी डी सावरकर की इस बात को कभी माना की हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं और न हीं मुस्लिम लीग और उसके नेता मोहम्मद अली जिनाह की इस बात को की ये दोनों अलग ‘राष्ट्र‘ हैं और साथ साथ नहीं रह सकते.

लेकिन जब मुस्लिम लीग ने 23 मार्च 1940 को अपना सम्मेलन कर पाकिस्तान की मांग कर डाली और अंग्रेज की मदद से उसे हासिल कर लिया तो मजबूरन गांधी जी को भी अपनी कांग्रेस की वर्किंग कमेटी द्वारा स्वीकार की गई बंटवारे की योजना को मजबूरन मानना पड़ा, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान भी उनका अपना देश है और वह जब चाहेंगे वहां जाकर रहेंगे.

दरअसल, महात्मा गांधी धर्म और जाति के आधार पर राजनीति किए जाने और ‘नेशन स्टेट‘ को बनाए जाने के खिलाफ थे, इसलिए वह हमेशा सांप्रदायिक तत्वों के निशाने पर रहे. बाद में ऐसे ही विचारधारा के एक व्यक्ति नेे उनकी हत्या कर दी.

महात्मा गांधी और उनके प्रमुख सहयोगी जैसे राजाजी, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरु कोई कम हिंदू नहीं थे. 1947 में बंटवारे के बाद और पाकिस्तान बन जाने के बाद भारत को आसानी से हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया जाता तो चूं भी नहीं होती, क्योंकि मुसलमान अपने हिस्से का पाकिस्तान ले चुके थे. लेकिन यह महात्मा गांधी की नैतिक शक्ति थी जिसने कहा कि हमने इस मुल्क की लड़ाई, जो 90 साल से भी ज्यादा समय तक लड़ी गई.

उसमें हमने अपनी अवाम के साथ वादा किया था कि जब हम आजाद होंगे तो ऐसा मुल्क बनाएंगे जिसमें किसी दूसरे मजहब की, किसी दूसरी भाषा का प्रभुत्व नहीं होगा. उसका गल्बा नहीं होगा और सबको बराबर का अधिकार होगा. इसलिए गांधी जी ने भारत को हिंदू राष्ट्र नहीं बनने दिया.

उनके सह-अस्तित्व की जो कल्पना है, वह तो ‘सबको सम्मति दे भगवान ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ गाने वाले व्यक्ति थे. उन्होंने कभी भी मुस्लिम लीग के उस दावे को नहीं माना कि वह सारे मुस्लिमों का पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व करती है.

दरअसल, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही तय हो गया था कि आजादी मिलने के बाद यह मुल्क कैसा होगा. इसका संविधान, उसकी विचारधारा क्या होगी. यह देश कैसे चलेगा ?1931 का कांग्रेस का कराची ‘रेज्यूल्युशन‘ हमारे आज के भारतीय संविधान की मूल आत्मा है. उसी समय यह तय हो गया कि यह देश आजादी के बाद एक सेक्युलर राष्ट्र होगा. एक लोकतांत्रिक समाजवादी देश होगा, जिसमें हर आदमी को बराबर का दर्जा और अधिकार होंगे.

महात्मा गांधी ने अपने सार्वजनिक जीवन में जितना दलित-हरिजन, आदिवासी, मुसलमान, पिछड़े, गरीब और कमजोर वर्गों के बारे में सोचा और किया उसका लेश मात्र भी हिंदू अगड़ी जातियों और समृद्ध उद्योगपतियों और व्यापारियों के लिए नहीं किया.

पाकिस्तान बनने के बाद वह जिस तरह ना सिर्फ हिंदुस्तानी मुसलमानों के समर्थन में खड़े आए, पाकिस्तानी मुसलमानों तक के हक की लड़ाई लड़ी. उनके लिए अपनी जान की बाजी तक लगा दी. गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का बयान है कि उनकी हत्या करने के पीछे गांधी का यह बयान भी था कि वह भारत सरकार से पाकिस्तान को उसके हिस्से का पचपन करोड़ रुपया दिए जाने की वकालत कर रहे थे.

महात्मा गांधी की कश्मीर पर राय

कश्मीर के बारे में महात्मा गांधी की क्या राय थी ? वह 29 जुलाई 1947 को दिए गए उनके भाषण से स्पष्ट हो जाता है. अपनी ऐतिहासिक कश्मीर यात्रा से दो दिन पहले 29 जुलाई को अपने प्रार्थना प्रवचन में महात्मा गांधी ने कहा था- ‘कश्मीर में राजा भी है और रैयत भी. मैं राजा को कोई ऐसी बात नहीं कहने जा रहा हूं कि वे पाकिस्तान में न सम्मिलित हों और भारतीय संघ में सम्मिलित हों. मैं इस काम के लिए वहां नहीं जाऊंगा.

वहां राजा तो है, लेकिन सच्चा राजा तो प्रजा है. …वहां के लोगों से पूछा जाना चाहिए कि वे पाकिस्तान के संघ में जाना चाहते हैं या भारतीय संघ में. वे जैसा चाहें, करें. राजा तो कुछ है ही नहीं, प्रजा सब कुछ है. राजा तो दो दिन बाद मर जाएगा, लेकिन प्रजा तो रहेगी ही. कुछ लोगों ने मुझसे कहा है कि यह काम मैं पत्र-व्यवहार के जरिए ही क्यों नहीं करूं. तो मैं कहूंगा कि इस तरह तो मैं पत्र-व्यवहार के जरिए ही नोआखाली का काम भी कर सकता हूं.’

जब पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर हमले की घटनाएं सामने आईं तो उन्होंने 26 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान और भारत दोनों को स्पष्ट तौर पर चेताते हुए कहा था – ‘रियासत (कश्मीर) की असली राजा तो उसकी प्रजा है. अगर कश्मीर की प्रजा यह कहे कि वह पाकिस्तान में जाना चाहती है तो कोई ताकत नहीं दुनिया में जो उसको पाकिस्तान में जाने से रोक सके. लेकिन उससे पूरी आजादी और आराम के साथ पूछा जाए.

उसपर आक्रमण नहीं कर सकते. उसके देहातों को जलाकर उसे मजबूर नहीं कर सकते. अगर वहां की प्रजा यह कहे, भले ही वहां मुसलमानों की आबादी अधिक हो, कि उसको तो हिन्दुस्तान की यूनियन में रहना है, तो उसको कोई रोक नहीं सकता.

अगर पाकिस्तान के लोग उसे मजबूर करने के लिए वहां जाते हैं तो पाकिस्तान की हुकूमत को उन्हें रोकना चाहिए. अगर वह नहीं रोकती है तो सारे का सारा इल्जाम उसको अपने ऊपर ओढ़ना होगा. अगर यूनियन के लोग उसे मजबूर करने जाते हैं, तो उनको रोकना है और उनको रुक जाना चाहिए. इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है.’

महात्मा गांधी का अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से भी बड़ा पुराना रिश्ता रहा है. एम.ए.ओ. कॉलेज के विश्वविद्यालय बनने के बाद 29 अक्टूबर 1920 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पहली बार अलीगढ. मुस्लिम विश्वविद्यालय पधारे थ.

1920 में मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली ने गांधी जी को अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्टैची हाल में ले जाकर वहां उनका भाषण कराया और वहां उस वक्त यह घटना एक तरह से कानून तोड़ने जैसी बात थी, क्योंकि वहां अंग्रेजों का राज था.

ज्यादातर लोग अंग्रेज परस्त थे.इसके बाद मोहम्मद अली, शौकत अली और उनके साथियों को निष्कासित कर दिया गया. उस दिन इसके विरोध में गांधी जी ने तय किया, अगर यह सरकारी विश्वविद्यालय है और मुझे बुलाने पर इतना हंगामा हो रहा है,

स्टूडेंट्स को निष्काषित किया जा रहा है तो मैं लोगों से अपील करता हूं कि आप अपनी एक अलग यूनिवर्सिटी बनाइए और इसलिए 1920 में जब अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को मुस्लिम यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला तब गांधी जी के नेतृत्व में अली ब्रदरान, हकीम अजमल खान और मुख्तार अहमद अंसारी वगैरह ने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की स्थापना की जो आज दिल्ली का एक बड़ा विश्वविद्यालय है.

मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब एक बहुत ही दिलचस्प किस्सा बयान करते है. वह कहते हैं ‘‘जब 1947 में दंगे शुरू हो गए. पाकिस्तान बनने के बाद जब मुसलमान पाकिस्तान भागने लगे. तो यह सवाल उठने लगा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का क्या होगा ? तो गांधी जी ने नेहरू जी को आदेश दिया कि वहां सेना भेजो, इसलिए वहां कुमाऊं रेजिमेंट भेजी गई जो वहां 6 महीने तक रही.

यह गांधी जी ने सुनिश्चित किया कि वहां किसी मुसलमान का बाल भी बांका न होने पाए और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी उसी तरह से चलनी चाहिए जैसे पिछले 50 सालों से चल रही है. यह गांधी जी का ही करिश्मा था.

मैं महात्मा गांधी को हिंदुस्तान का सबसे बड़ा हिंदुस्तानी मानता हूं. एक हिंदुस्तानी होने के लिए जो सारी खूबियां होनी चाहिए किसी भी व्यक्ति में वह सारी महात्मा गांधी में मौजूद थीं. वह इसलिए वास्तव में राष्ट्रपिता कहलाते हैं और हम उन्हें अपना बाबा-ए-कौम मानते हैं.

( साभार आवाज़ द वॉइस, लेख वरिष्ठ पत्रकार हैं. बीबीसी में लंबे समय तक काम कर चुके हैं और यह इनके व्यक्तिगत विचार हैं.)

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