रमजान के इस्लाम के साथ सामाजिक और वैज्ञानिक पहलू भी हैं

सलमान अब्दुस समद

जैसे लोकतंत्र चार बुनियाद पर टिका है. वैसे ही इस्लाम पांच बिंदुओं पर आधारित है. इन पांच बिंदुओं को हम इस्लाम के पांच बुनियादी स्तंभ कह सकते हैं. यह स्तंभ हैं- कलिमा, प्रार्थना(नमाज), उपवास(रोजा), जकात और हज. इन पांचों में से तीन बिंदु ऐसे हैं जिनका धन से कोई लेना-देना नहीं. जबकि जकात और हज का काफी हद तक धन और पूंजी से संबंध है. रोजा एक ऐसा फर्ज है जो हर मुसलमान के लिए जरूरी है. वह चाहे अमीर हो या गरीब.

इसके अलावा ये पहलू भी अहम है कि उपवास यानी रोजे का महत्व इस्लामिक दृष्टिकोण के अलावा वैज्ञानिक संदर्भ में भी इसके बहुत से सारे लाभ है. इसके अलावा, रोजे से सामाजिक पहलू भी जुड़ा है. नीचे हम रोजे के इन तीन महत्वपूर्ण पहलुओं की व्याख्या करेंगे ताकि रोजे का वास्तविक अर्थ को समझा जा सके.

इस्लाम और रोजाः يأَيُّهاَ الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا کُتِبَ عَلَيْکُمُ الصِّيَامُ کَمَا کُتِبَ عَلَی الَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِکُمْ لَعَلَّکُمْ تَتَّقُوْنَ (البقرة، 2: 183)

अनुवादः ऐ ईमान वालों रोजा तुम्हारे लिए निर्धारित (फर्ज) किया गया है जैसा कि तुमसे पहले के लोगों के लिए भी निर्धारित किया गया था, ताकि तुम लोग मुत्तकी (परहेज़गार) बनो.

– कुरान की इस आयत से तीन बातें स्पष्ट हैं

1.मुसलमानों पर रोजे फर्ज हैं, जो इसको छोड़ेगा वह फर्ज छोड़ने का गुनेहगार होगा.

2.रोज, कुरान से पहले भी लोगों पर फर्ज था, अर्ताथ रोजे कि रिवायत पुरानी है.

3.रोजे का मकसद मुत्तकी और परहेजगार बनना है. अर्ताथ अच्छा इंसान बनना है. रोजा केवल भूखे रहने का नाम नहीं, बल्कि रोजे रखकर अच्छा इंसान भी बनना है.

खुदा की मांश है कि रोजे के सहारे आदमी मुत्तकी और अच्छा इंसान बने. जाहिर है जब आदमी अच्छा इंसान बनेगा तो समाज को भी लाभ होगा. इसलिए हदीस में आया हैः

مَنْ صَامَ رَمَضَانَ اِ يْمَانًا وَّ اِحْتِسَابًا غُفِرَ لَه. مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِه. (بخاری، الصحيح، کتاب الصوم)

‘‘जो ईमान वाला सवाब कि उम्मीद से रमजान में रोजे रखता है, उसके पिछले ( बहुत से गुनाहों ) पापों को माफ कर दिया जाता है.इसलिए माफ कर दिया जाता है, इंसान खुद को बेहतर बनाता है और समाज को बेहतर करता है.

रोजा का सामाजिक पहलू

रोजे में जहां दिन भर खाने-पीने की मनाही है, वहीं जोर देकर बहुत सी सामाजिक बुराइयों से रोका गया है. गाली देने और चुगलखोरी करने से हमेशा इस्लाम मना करता है.

रमजान में, कई हदीस में इन बुराइयों से बचने की ताकीद की गई है. हज़रात मुहम्मद ने फरमाया कि सिर्फ खाने से बचे रहना ही रोजा नहीं, आँखों, जुबान और कानों का भी रोजा होता है. अर्ताथ हमें बदन के इन अंगों को बुरी चीजों से बचाना जरूरी है.

तब कहीं जाकर एक रोजा पूरा होगा. इन बिंदुओं पर गौर करें तो मालूम होगा कि एक इंसान इन बुराइयों से बचेगा तो तो एक बेहतरीन और स्वस्थ समाज सामने आएगा. यहां हमें रोजे का सामाजिक पहलू भी समझ में आता है.

रोजा के सामाजिक पहलू को इस तरह भी समझ सकते हैं. जब कोई व्यक्ति भूखा होता है, तो उसके दिमाग में तरह-तरह के विचार आते हैं. वह अपनी भूख के कारण खुदा के करीब होने के साथ दुनिया में भूखे लोगों की भूख को भी महसूस करता है.

इस तरह व्रत ( रोजा) रखने से व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का दर्द महसूस होता है. उपवास एक व्यक्तिगत इबादत जरूर है, लेकिन इसके माध्यम से एक व्यक्ति को अपने समाज के दूसरे व्यक्ति को समझने का मौका मिलता है. ऐसे में वह अपने समाज के दूसरे लोगों के लिए बहुत कुछ करने को प्रेरित होता है.

रोजा और विज्ञान

जापानी वैज्ञानिक योशी नोरी को 2016 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उन्होंने कैंसर के इलाज के संबंध में जहां बहुत सी बातें कहीं, वहीं उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति साल में एक बार 12 से 16 घंटे 20 से 27 दिन तक भूखा रहे तो कैंसर पैदा करने वाली, सड़ी-गली और निष्क्रिय कोशिकाएं अपने आप गायब होने लगती हैं.

इस प्रकार, स्वस्थ लोगों में कैंसर का खतरा कम होता है. इसी संदर्भ में हम रोजे को भी देख सकते हैं. क्योंकि रोजा रखने वाला 12 से 16 घंटे भूखा रहता है. रोजे रखने से सहनशीलता भी बढ़ती है. इच्छाओं को नियंत्रित करना भी यह सिखाता है.

रोजा केवल व्यक्तिगत इबादत नहीं , बल्कि इसकी गहराई में जाने से स्पष्ट होता है कि यह वास्तव में एक बेहतर समाज के निर्माण का एक साधन है. रोजे के दौरान जिन बुराइयों से बचने का हुक्म दिया गया है,

अगर कोई व्यक्ति उनसे बचना शुरू कर दे, तो एक बेहतर और स्वस्थ समाज का निर्माण होगा. इसके अलावा, उपवास के वैज्ञानिक लाभ भी हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों को साल भर में कई दिनों तक खाने-पीने से बचना चाहिए. पेट की आंतें साफ होती हैं. मानव शरीर तरोताजा होता है.

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