आतंकी का टैग तो हटा गया, लेकिनहमारे खोये हुए 9 साल कोन वापस ला सकता है?

राशिद 35 और शाहिद 22  उन पांच लोगों में शामिल हैं जिन्हें यूएपीए के तहत नौ साल बाद बरी किया गया।

मो. राशिद के पिता को अपनी दुकान भी बंद करनी पड़ी क्योंकि उनके ग्राहक उन्हें “आतंकवादी” और “जिहादी” कहते थे। मो. शाहिद को अभी भी नौकरी वापस नहीं मिली है जो उनके परिवार के लिए आजीविका का एकमात्र स्रोत था, जिसे उन्होंने तब खो दिया  था जब पुलिस ने नौ साल पहले उनके दरवाजे पर दस्तक दी थी। और समाज ने जब मेरे परिवार को बहिष्कृत कर दिया था।

बरी होने के कुछ दिनों बाद राशिद कहते हैं उन भयानक वर्षों की भरपाई कोई नहीं कर सकता जब मुझे आतंकवादी होने के टैग के साथ जीना पड़ा वहीँ शाहिद कहते हैं की मै जेल में बहुत रोता था, अपने भाग्य के बारे में सोचता था, कि क्या मैं अपने परिवार को फिर कभी देख पाऊंगा गिरफ्तारी के समय शाहिद की उम्र मात्र 22 साल थी।

तीन अन्य लोगों के साथ, दोनों को दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने 2013 में कड़े गैरकानूनी गतिविधि अधिनियम (यूएपीए) के तहत पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूह लश्कर-ए-तैयबा के साथ संबंध रखने और शामिल होने के लिए गिरफ्तार किया था। भारत में आतंकी कृत्यों को अंजाम देने के लिए पैसे जुटाने के लिए फिरौती के लिए एक व्यापारी का अपहरण करने की योजना में।

9 मई को सभी पांचों को दिल्ली की एक अदालत ने बरी कर दिया है और कहा गया था कि अभियोजन पक्ष का मामला “किसी भी विश्वसनीय सबूत के बजाय  सिर्फ अनुमानों अनुमानों पर आधारित था।

राशिद, जो हरियाणा के नूंह जिले में एक स्कूल शिक्षक के रूप में काम करते थे 2013 में उन्हें यूएपीए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था।

राशिद कहते हैं की मैं एक स्कूल में शिक्षक के रूप में काम करता था और घर पर ट्यूशन भी लेता था। पुलिस ने मुझे इस मामले में झूठा फंसाया और मैंने अपने जीवन के 9  महत्वपूर्ण वर्ष गंवाए हैं। वह कहते हैं मैं अपने परिवार को याद करता रहा कि वे एक आतंकवादी के परिजन होने के कलंक से कैसे निपट रहे होंगे। मेरे रिश्तेदारों और हमारे पड़ोसियों ने मेरे परिवार से सारे नाते तोड़ लिए थे। मैं अपने दादा-दादी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सका जिनका कुछ साल पहले निधन हो गया था।

जेल के साथी कैदियों ने मुझे एक खूंखार अपराधी के रूप में देखा। मेरे जैसे किसी व्यक्ति के लिए जो जीवन में कभी अदालत नहीं गया था या मेरी गिरफ्तारी तक जेल भी नहीं देखा था यह एक दर्दनाक वक़्त था।

वहीँ शाहिद कहते हैं जो की नूह के मेओली गाओं मे मस्जिद के इमाम के रूप मे कार्यरत थे, मैं जुमे की नमाज़ की तैयारी कर रहा था जब पुलिस मेरे घर आई। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी के फोन पर मेरे खिलाफ कुछ सबूत मिले हैं और वे मुझे गिरफ्तार करने आए हैं। उन्होंने मुझे मेरी प्रार्थना भी पूरी नहीं करने दी।

शाहिद कहते हैं कि गिरफ्तारी के एक महीने बाद तक मुझे उस मामले का पता भी नहीं चला जिसके तहत उन पर मामला दर्ज किया गया था।

तिहाड़ जेल के कानूनी सहायता केंद्र के वकीलों ने हमें बताया कि हम पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया है और जमानत मिलना बहुत मुश्किल है।

राशिद ने कहा कि अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश में खोए हुए नौ महत्वपूर्ण वर्षों को कोई भी किसी हल मे वापस नहीं ला सकता है।

राशिद कहते हैं मेरी भतीजी और भतीजे मुझे नहीं पहचानते। इतने सालों के बाद घर लौटना और अजीब लगता है। अदालत अब कहती है कि हमारे खिलाफ कोई सबूत नहीं है, लेकिन हम जिस आघात और पीड़ा से गुजरे हैं, उसका क्या?  मेरी जॉब अभी तक मुझे वापस नहीं मिली,

वही शाहिद कहते हैं  पिछले चार वर्षों से जमानत पर बाहर होने के बावजूद जिस दौरान उन्हें अदालती सुनवाई में भाग लेना पड़ा एक इमाम के रूप में अपनी नौकरी वापस पाने में सक्षम नहीं था, “मेरी नौकरी ही मेरे परिवार की आजीविका का एकमात्र स्रोत थी। अब जब मुझे सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया है, मैं ड्यूटी पर लौटने की कोशिश करूंगा।

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