भारतीय संविधान को बनाने में मुस्लिम आलिमों की ख़ास शिराकत

भारतीय संविधान दिवस पर विशेषः

राकेश चौरासिया / नई दिल्ली

संविधान सभा की ड्राफ्ट कमेटी के अध्यक्ष डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान तैयार करके राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को सौंपा था. इस अवसर पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद भी उपस्थित थे.

इसलिए 26 नवंबर को हमारे देश का संविधान दिवस मनाया जाता है. संविधान मसौदा समिति में कुल आठ प्रमुख सदस्य थे, जिनमें सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला और प्रांतों व राज्यों के सदस्यों के तौर पर कई दर्जन मुस्लिम आलिम भी सदस्य थे. इन मुस्लिम सदस्यों ने मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दों को तो मसौदे पर चर्चा के दौरान उठाया ही, बल्कि मुस्लिम सदस्यों ने देश के विभिन्न मसलों खासकर हिंदू अधिकारों के लिए भी अपनी राय प्रमुखता से रखी.

भारतीय संविधान की मसौदा समिति बहुत व्यापक थी. 29 अगस्त 1947 को डॉ. बीआर अम्बेडकर की अध्यक्षता में मसौदा समिति नियुक्त की गई थी. समिति के अन्य छह सदस्य के.एम. मुंशी, सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, गोपाला स्वामी आयंगर, एन. माधव राव (उन्होंने खराब स्वास्थ्य के कारण इस्तीफा देने वाले बी.एल. मित्तर का स्थान लिया), टी.टी. कृष्णामाचारी (उन्होंने डी.पी. खेतान का स्थान लिया, जिनका निधन 1948 को हो गया था). अध्यक्ष सहित सभी आठ मूल सदस्य देश के मंजे हुए कानूनी विशेषज्ञ थे.

स्वतंत्रता-पूर्व भारत में असम के प्रधानमंत्री रहे एवं प्रमुख बैरिस्टर सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला के अलावा भारत की संविधान सभा के प्रांतीय सदस्यों में भी मुस्लिम आलिमों को स्थान दिया गया था.

इनमें मद्रास प्रांत से शेख गालिब साहिब, एम. मुहम्मद इस्माइल, के.टी.एम. अहमद इब्राहिम, महबूब अली बेग साहिब बहादुर, बोम्बे प्रांत से अब्दुल कादर मोहम्मद शेख, अब्दुल कादिर अब्दुल अजीज खान, बंगाल प्रांत से जसीमुद्दीन अहमद, नजीरुद्दीन अहमद, अब्दुल हामिद, अब्दुल हलीम गजनवी, संयुक्त प्रांत से मौलाना हिफजुर रहमान सेहरवी, खुर्शीद लाल, हैदर हुसैन, हसरत मोहानी, अबुल कलाम आजाद, नवाब मोहम्मद इस्माइल खान, रफी अहमद किदवई, जेडएच लारी, बशीर हुसैन जैदी, बेगम एजाज रसूल, बिहार से हुसैन इमाम, सैयद जाफर इमाम, एसएम लतीफुर रहमान, मोहम्मद ताहिर हुसैन, तजामुल हुसैन, चौधरी आबिद हुसैन, मध्य प्रांत एवं बेरार से काजी सैयद करीमुद्दीन, असम से अब्दुर रौफ, जम्मू और कश्मीर से शेख मुहम्मद अब्दुल्ला, मिर्जा अफजल बेग, मौलाना मोहम्मद सईद मसूदी, त्रावणकोर से पी.टी. मोहम्मद शामिल रहे.

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सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला
सर सैयद मुहम्मद सादुल्ला ब्रिटिश भारत में असम के प्रधानमंत्री थे. वह 1919 में गोहाटी नगर पालिका के अध्यक्ष और 1924 से 1934 तक असम के लिए शिक्षा और कृषि के प्रभारी मंत्री भी रहे. संविधान के मसौदे को कुछ सदस्यों ने ‘पैच वर्क’ की उपमा देकर व्यंग्य किया था.
इस पर मसौदे का बचाव करते हुए सर सादुल्ला ने कहा था, ‘‘…मैं माननीय सदस्यों को कैसे बताऊं कि हमने एक मसौदा तैयार करने के लिए, जिसे पैच-वर्क के अलावा और कुछ नहीं कहा गया है, तीन अलग-अलग महाद्वीपों के सभी ज्ञात संविधानों, प्राचीन और हाल के सभी ज्ञात संविधानों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है कि हमने अपनी पूरी कोशिश की और मेहनत की?
लेकिन जो लोग कला के जानकार हैं, जो शिल्प से प्यार करते हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि पैच-वर्क से भी, सुंदर पैटर्न, बहुत प्यारे डिजाइन बनाए जा सकते हैं. मैं दावा कर सकता हूं कि हमारे मसौदे में कमियों के बावजूद हमने एक पूरी तस्वीर पेश करने की कोशिश की है, इस माननीय सदन को जितना संभव हो, उतना पूरा दस्तावेज देने के लिए जो इस सदन में चर्चा का आधार बन सकता है.
मसौदा समिति ने कभी भी यह दावा नहीं किया कि यह संविधान पर अंतिम शब्द है, कि इसके प्रावधान अचूक हैं या इन अनुच्छेदों को बदला नहीं जा सकता है. यह तथ्य कि इस मसौदे को अंतिम स्वीकृति के लिए इस सम्मानित सदन के समक्ष रखा गया है, यह दर्शाता है कि हम किसी न किसी नीति के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं.’’
सर सादुल्ला ने राज्यपाल के लिए एक संशोधन रखा, जिसे सभा ने स्वीकार कर लिया था. उन्होंने चर्चा में कहा था, ‘‘हमने एक सिद्धांत निर्धारित किया है कि प्रांतीय संविधान में की जाने वाली सभी कार्रवाई राज्यपाल के नाम पर की जाएगी.
विधानसभा द्वारा लिए गए इस निर्णय को प्रभावी करने के लिए कई चीजें हैं, जिन्हें रखा जाना है और जिसे भारत सरकार अधिनियम में जगह दी गई है. फिर ऐसे प्रावधान हैं, जो अन्य संविधानों में सहायक हैं और कुछ अन्य प्रावधान, जिन्हें आमतौर पर संविधान में जगह मिलनी चाहिए. इन सभी को हमारे मसौदे में शामिल करना होगा, भले ही उन पर चर्चा न की गई हो, अब तक यहां निर्णय लिया है.
हमने लगभग सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं पर निर्णय लिए हैं. उन पर अमल किया जाएगा लेकिन मसौदे में ऐसी चीजें भी होंगी, जो इनके लिए सहायक हैं और ऐसी सभी चीजें जो अन्यथा आवश्यक हैं.’’
सर सादुल्ला ने इसके अलावा केंद्र प्रशासित क्षेत्रों, जूट उत्पादन और निर्यात शुल्क तथा चाय बागान की समस्याओं पर चर्चा में प्रमुख सुझाव दिए. सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए मसौदा समिति में प्रमुखता से अपनी बात रखी, बल्कि उन्होंने भारत का भावी स्वरूप कैसा हो, इसके लिए उन्होंने व्यापक रूप से विचार साझा किए.
सादुल्लाह ने खासतौर से अनुसूचित जनजाति आरक्षण के मामले में बड़ी मेहनत की और उनकी राय को तरजीह भी दी गई. तब अंग्रेज कुछ आदिवासी जातियों को क्रिमिनल ट्राइब्स कहते थे और उन्हें तमाम सुविधाओं से वंचित कर रखा था.
आजादी के बाद भी कुछ नेता इनके साथ वैसा ही सलूक करना चाहते थे. यहां तक कि उन्हें वोट देने के अधिकार से भी वंचित करना चाहते थे. ऐसे समय में जयपाल मुंडा ने उन कद्दावर नेताओं के विरुद्ध और आदिवासी जातियों के समर्थन में डटकर आवाज उठाई.
इस मुद्दे पर जयपाल मुंडा को सर सैयद मोहम्मद सादुल्लाह का भरपूर साथ मिला. सादुल्लाह ने कहा कि अंग्रेजों के विरोध के लिए जनजातियों को दंडित नहीं किया जा सकता.
इन मुस्लिम सदस्यों ने हिंदू हकों के लिए प्रमुखता से आवाज उठाई. संविधान सभा में 24 नवंबर 1948 की बहस में भाग लेते हुए सादुल्ला ने कहा, ‘‘मैं हमारे संविधान के निर्माताओं को भी बाधित नहीं करना चाहता, अगर वे खुले में आते हैं और सीधे कहते हैं, यह हमारे धर्म का हिस्सा है. गाय को वध से बचाया जाना चाहिए और इसलिए हम चाहते हैं कि इसका प्रावधान या तो मौलिक अधिकारों में हो या फिर निदेशक सिद्धांतों में.’’ गोवंश संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त करने के लिए सादुल्लाह और अन्य सदस्यों के अलावा जहीर-उल-हसन लारी ने भी कहा, ‘‘…आगे आना और मौलिक अधिकारों में एक खंड शामिल करना बेहतर है कि गोहत्या अब से निषिद्ध है, बजाय इसके कि इसे निर्देशक सिद्धांतों में अस्पष्ट छोड़ दिया जाए …’’
जिस तरह अभी कुछ सीटें अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व रहती हैं. उसी तरह कुछ मुस्लिम सदस्यों का विचार था कि कुछ सीटें मुस्लिमों के लिए भी आरक्षित की जाएं. इस विचार को ‘आत्मघाती’ बताते हुए बेगम एजाज रसूल ने सख्त मुखालफत की.
बेगम एजाज रसूल भारत की संविधान सभा में एकमात्र मुस्लिम महिला थीं, जिन्होंने भारत के संविधान का मसौदा तैयार किया था. वे अल्पसंख्यक अधिकार मसौदा उपसमिति की सदस्य थीं.

धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटों की मांग स्वेच्छा से छोड़ने के लिए मुस्लिम नेतृत्व के बीच सहमति बनाने में बेगम एजाज रसूल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

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बेगम एजाज रसूल

मसौदा समिति की एक सभा में अल्पसंख्यकों के अधिकार से संबंधित चर्चा के दौरान, उन्होंने मुसलमानों के लिए ‘पृथक निर्वाचक मंडल’ के विचार का विरोध किया. बेगम ने इस विचार को ‘आत्म-विनाशकारी हथियार’ के रूप में उद्धृत किया, जो अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से हमेशा के लिए अलग कर देता.

1949 तक, अलग निर्वाचक मंडल की इच्छा रखने वाले मुस्लिम सदस्य भी बाद में बेगम की अपील को स्वीकार करने के लिए आगे आ गए. इस तरह मुस्लिम सदस्यों ने संविधान को बनाने में अहम भूमिका निभाई.

साभार: आवाज द वॉइस

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