कैसे मिली आजादी ? जानिए 109 साल के इमामउद्दीन की जुवानी

फैजान खान/ आगरा

आजादी की लड़ाई में आगरा कभी पीछे नहीं रहा. यहां के रणबांकुरों ने अंग्रेजों से जमकर मुकाबला किया. इस आजादी के लिए न जाने कितनों की शहादत हुई. फिर भी जोश में कमी नई आई थी. जिस तरफ निकल जाते गोरों में दहशत व्याप्त हो जाती. कई मौके तो ऐसे आए कि अंग्रेज भी आगरा में स्वतंत्रता सेनानियों से डरने लगे थे. चारों ओर इंकलाब जिंदाबाद और हर हाल में मुल्क को आजाद कराकर रहेंगे….जैसे नारे ही गूंजते थे. यह कहना है आगरा के 109 साल के इमामुद्दीन कुरैशी ने.

इमामुद्दीन 109 साल के होने के बावजूद स्वस्थ्य हैं और उनकी याद्दाश्त बिलकुल तरो-ताजा है.उनसे जब आजादी की बात हुई तो उनका गला भर आया. आंखों में आंसू आ गए. मौजूदा हालात पर कहने लगे-आजादी के लिए एक साथ लड़े थे लेकिन आजाद होने के बाद हम बिखए गए. अगर, आज जैसे हालात होते तो अंग्रेजों की गुलामी से कभी मुक्ति नहीं मिल पाती. न आजाद हो पाते.

उन्होंने बताया- हम और हमारी टोली अंग्रेजों के खिलाफ जंग की रणनीति बनाने के लिए अलग-अलग जगहों का इस्तेमाल करती थी. खाकसार आंदोलन में आगरा-फिरोजाबाद की अगुवाई करने वाले इमामुद्दीन कुरैशी ने कहा, अंग्रेजों की एयरफोर्स में मीट सप्लाई का काम करते थे. जब भारतीयों पर जुल्म हुआ तो देश को आजाद कराने के लिए हमने नौकरी छोड़ दी.

खाकसार आंदोलन से जुड़े लोग खाकी पठानी सूट और हाथ में बेलचा लेकर चलते थे, जैसे ही कोई अंग्रेज दिखता उस पर टीम टूट पड़ती थी. हम घरो की छतों पर बैठकर अंग्रेजों के आने का इंतजार करते थे.

पाकिस्तान में दिल नहीं लगा तो वापस आए

देश आजाद हुआ तो आगरा से बहुत से रिश्तेदार और हमारी बहन और बहनोई पाकिस्तान चले गए. मैं भी चला गया. मैंने अपनी बेगम से कहा तो उन्होंने मना कर दिया. फिर भी अपने बेटे सिराज कुरैशी को छोड़कर मैं चला गया.

तीन साल पाकिस्तान में रहकर चमड़े की रंगाई का काम किया लेकिन हिंदुस्तान हमेशा दिल में रहा. अपने की याद सताने लगी. वो जंग की यादें जो हिंदू-दोस्तों के साथ मिलकर लड़ी. एक दिन अपना सारा पैसा अपनी बहन और अन्य रिश्तेदारों को देकर पानी के जहाज से वापस आगरा आ गया.

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आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन पर घेरते थे अंग्रेजों को

इमामुद्दीन कुरैशी ने बताया, जहां हम रहते थे वहां से चंद कदम की दूरी पर ही आगरा फोर्ट रेलवे स्टेशन था. इसी स्टेशन पर अंग्रेज बड़ी संख्या में उतरते थे और दूसरे शहरों के लिए रवाना होते थे. इसलिए यहां आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के लिए हमेशा खतरा रहता था.

जैसे ही हमें या अन्य लोगों को पता चलता कि अंग्रेज आ रहे हैं उन पर गुरिल्ला हमला कर देते थे. गोरों पर हमला करके मंटोला, नाई की मंडी, ढोलीखार की छोटी-छोटी गलियों में छुप जाते. अंग्रेज तलाशते हुए इन जगहों पर दबिश देते तो हम लोग पिनाहट और राजखेड़ा के बीहड और चंबल में छिप जाते थे. कई दिनों बाद फिर से आ जाते हमला करने को.

उन्होंने कहा कि तब हर गली से इंकलाब जिंदा बाद और गोरों को भगाएंगे मुल्क को आजाद कराएंगे और आधी रोटी खाएंगे देश को आजाद कराएंगे जैसे नारे सुनाई देते थे.उन्होंने बताया कि काकोरी कांड के समय आगरा में भारी तनाव हो गया था. अंग्रेज आगरा पर खास नजर रखे हुए थे.आजादी के दौरान ही देश के कई चर्चित शहीदांें से उनकी मुलाकात हुई थी. कई के छुपने का इंतजाम भी उन्होंने करवाया था.

आज की पीढ़ी को सुनानी होंगी जंग-ए-आजादी की कहानी

पहलवान इमामुद्दीन कुरैशी ने कहा कि आज की पीढ़ी को बताना होगा कि आजादी की जंग का इतिहास शूरवीरों के किस्सों से भरा पड़ा है. इनमें कई ऐसे हैं, जिनकी बहादुरी के चर्चे आज भी होते हैं. उस दौर की निशानियां अभी भी जीवंत हैं, जो आजादी की लड़ाई के गवाह हैं. क्रांतिवीरों की याद दिलाते हैं. गौरवशाली गाथा सुनकर और पढ़कर एक अभिमान की अनुभूति होती है.ं गर्व से सीना फूल जाता है.

आज होता है दुख

इमामुद्दीन कुरैशी कहते हैं कि जिस तरह से देश के हालात हैं उसे देखकर बड़ा दुख होता है. पहले पता ही नहीं होता था कौन हिंदू-कौन मुस्लिम है. बस एक ही जुनून था कि मुल्क को कैसे आजाद कराएं. इसी जद्दोजहद में पूरा दिन निकल जाता. बस एक ही ख्वाहिश हुआ करती थी कि कैसे भी अंग्रेजों को देश से भगाया जाए…पर, आज के हालत को देखकर बहुत दुख भी होता है.

अगर आज जैसे हालात पहले होते तो मुल्क कभी भी आजाद न होता. पता नहीं आज क्या हो गया है. कभी एक थाली में बैठकर खाने वाले राम-रहीम अब एक दूसरे से बात करना तक पसंद नहीं करते.

साभार: आवाज द वॉइस

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