अवैस अम्बरः बोरा पर बैठ पढ़ाई की, शिक्षा जगत में कर रहे नई क्रांति

सेराज अनवर / पटना

लगन, जज्बा, जुनून इंसान को उस बुलंदी पर जरूर पहुंचा देते हैं, जिस मुकाम पर आप खुद को देखना चाहते हैं. ऐसी ही एक शख्सियत का नाम है अवैस अम्बर. बिहार के जहानाबाद के एक छोटे से गांव एरकी का यह लड़का एक दिन देश के शिक्षा जगत में अपनी सोच, योग्यता का झंडा गाड़ देगा, किसने सोचा था. अवैस की संघर्ष गाथा फर्श से अर्श पर छा जाने की सच्ची दास्तान है, जिसने खुद बोरा पर बैठ कर पढ़ाई की. महज एक दशक की छोटी यात्रा के बाद अवैस आज बुलंदी के उस मुकाम पर हैं, जिन्हें देश के नामचीन विश्वविद्यालय खुद से जोड़कर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं.वे रोजमाइन के नाम से एक एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन हैं. रोजमाइन की बुनियाद सात हजार रुपये किराये के मकान में रखी गयी थी.आज देश भर में इस संस्थान की 40 शाखाएं हैं, जिसमें 37 के प्रभारी हिंदू हैं. शिक्षा में योगदान के लिए भारत के दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से लेकर नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति विधा देवी भंडारी ने अवैस अम्बर को सम्मानित किया है.

रोजमाइन एक एजुकेशनल एंड चौरिटेबल ट्रस्ट है. रोजमाइन की बुनियाद 2011 में सात हजार रुपये किराये के मकान में रखी गयी थी. आज देश भर में इस संस्थान की 40 शाखाएं हैं. प्रारम्भ में पटना न्यू डाकबंगला रोड स्थित हीरा इनक्लेव में 980 स्क्वायर फीट पर चलनेवाली रोजमाइन आज पूरे देश में 50 हजार स्क्वायर फीट एरिया में चल रही है. नेपाल में भी एक ब्रांच काम कर रहा है. पटना में मुख्यालय है. इसके अलावा हरियाणा, उत्तरप्रदेश, झारखंड, बंगाल, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, अंडमान निकोबार, उड़ीसा, चंडीगढ़ में बजाब्ता शाखाएं कार्यरत हैं.

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रोजमाइन का अर्थ फूलों का बगीचा होता है. हर रंग के फूल. खुशबू बिखेरनेवाले फूल. नाम के मुताबिक रोजमाइन भी तालीम की खुषबू बिखेर रही है. जो न हिन्दू है, न मुसलमान, शिक्षा सबके लिए जरूरी है.

इसलिए नाम भी मजहबी नहीं है इस संस्थान का. हिन्दू-मुस्लिम के भेदभाव के बिना, रोजमाइन देश की कौमी एकता का प्रतीक भी है. रोजमाइन की प्राथमिकता सिर्फ इतनी है कि पैसा और सुविधाओं के अभाव में इंजीनियरिंग व अन्य तकनीकी शिक्षा से वंचित छात्र-छात्राओं को देश भर के कॉलेजों में नामांकन करवाकर उन्हें उनके पैरों पर खड़ा किया जाये.

छात्रों को एक पैसा फीस के रूप में नहीं देना होता है. सिर्फ उन्हें छात्रावास में रहने और खाने-पीने का खर्च उठाना पड़ता है. किसी भी धर्म- जाति के छात्र हों. अगर आपके पास पढ़ने के लिए पैसे नहीं है, तो रोजमाइन 12वीं में 50 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाले छात्रों का सीधा तकनीकी कॉलेजों में नामांकन करवाने की जिम्मेदारी लेती है.

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एपीजे अब्दुल कलाम हैं प्रेरणास्रोत

दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को प्रेरणास्रोत माननेवाले अवैस अम्बर का तर्क है कि देश के हर व्यक्ति को ऊंचा सोचने और बड़ा करने का अधिकार है. कोई ठान ले तो धर्म-जाति कोई रोक नहीं सकता है.

कलाम साहब की मिसाल देते हुए अवैस कहते हैं कि कुछ बनने के लिए उन्होंने अखबार तक बेचा. विज्ञान पर काम किया. मिजाईलमैन बने और फिर बेमिसाल राष्ट्रपति बनकर दिखाया.

अवैस का कहना है कि किसी भी समाज का मापदंड उसकी शिक्षा व्यवस्था तथा नैतिकता के आधार पर तय किया जा सकता है. अवैस ने देश की शिक्षा व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन के लिए लम्बी जद्दोजहद की.

पूरे देश में घूम-घूम कर लोगों से बात करने, शिक्षा की जरूरत को समझाने का दौर चला. इस दौरान नींद और चैन खोया, परिवार और दोस्ती खोयी. इस मिशन की सफलता के लिए अपने मासूम बच्चों का बचपन कुर्बान कर अपने दफ्तर में ही बेबी रूम बना दिया. उन्हें तीन महीने से चार साल तक यहीं पलते-बढ़ते देखा. समाज की शादियों में शिरकत नहीं की. आज अवैस अम्बर देश की शिक्षा जगत में एक सम्मानित नाम है.

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2015 में अपनी मौत से एक सप्ताह पूर्व उत्तरप्रदेश के बिजनौर में एक समारोह में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने अम्बर को मेंटरशिप अवार्ड से नवाजा था. 2019में नेपाल की पूर्व राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने अम्बर को सम्मानित किया. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर एके सिंह द्वारा भी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए अम्बर को सम्मानित किया.

दलील से तय की तालीम की मंजिल

उच्च शिक्षा में बड़े पैमाने पर ड्रॉपआउट केस है. इस समस्या के समाधान के लिए अम्बर ने देशभर के कॉलेज प्रबंधन से मुलाकात की, उन्हें समझाया और गुजारिश की कि खाली रह जाने वाली साठ-चालीस प्रतिशत सीटों में से रोजमाइन से बीस बच्चा ले लें. प्रारंभ में बारह कॉलेज से 10-10सीट लीं.एक दशक के अपने छोटे सफर में रोजमाइन ने 30हजार से अधिक छात्रों को तकनीकी शिक्षा में दक्ष करा उन्हें रोजगार के लायक बना दिया.

अवैस अम्बर की दलील गजब की है. वह कहते हैं कि समाज में दूसरा सर सैयद पैदा करने के लिए यूनिवर्सिटी कॉलेज खोलने की जरूरत नहीं है, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था में एक मजबूत दखल की जरूरत है, जहां आपकी आवश्यकता मजबूरी बन जाये. अवैस  कहते हैं कि एक साल में हम उतने छात्र-छात्राओं को पढ़ायेंगे, जितना एक वक्त के दस सालों में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने नहीं पढ़ाया. हमने कोई कॉलेज, यूनिवर्सिटी नहीं खोली.

उनका कहना है कि देश भर में उच्च शिक्षा में 68 से 70 प्रतिशत सीटें खाली हैं. यह हम नहीं, देश के शिक्षामंत्री कह रहे हैं. मेरा सिर्फ यह कहना है कि उन सीटों पर सरकार से रोजमाइन का समझौता हो.

एक पढ़ा-लिखा मुल्क पढ़े-लिखे के बराबर खड़ा हो सकता है. अवैस मिशन संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं. इसके लिए रोजमाइन ने रोडमैप के साथ ब्लू प्रिंट तैयार किया है. वह कहते हैं कि देश की तरक्की का एकमात्र उपाय शिक्षा है.

इसके लिए ब्लू प्रिंट जरूरी है. अवैस के मुताबिक एक दशक में मंजिल तक पहुंचने के लिए सड़क बनायी, प्लेन रनवे पर आ चुका है. उड़ान में बिल्कुल मुश्किल नहीं होगी. देश मेरे साथ खड़ा होकर विश्वास करे, अन्यथा विश्वास नहीं करने की वजह बताये. वह कहते हैं कि विश्वास सिर्फ उन्हें नहीं है, जिन्होंने हमारे मिशन की तहकीक नहीं की.

हजरत मोहम्मद ने चौदह सौ साल पूर्व फरमाया था बगैर जांच-पड़ताल के आरोप न लगाओ. हमारे यहां 70 प्रतिशत हिन्दू बच्चे हैं, वह आबादी हम पर विश्वास कर रही.

मुस्लिम समाज से अपील

अम्बर कहते हैं कि यह मिशन कलाम साहब का है, सर सैयद का है. शिक्षा का मिशन डॉ. अम्बेडकर का है. सर सैयद ने 1875-2022 (एएमयू की स्थापना से अब तक) तक जितने लोगों को पढ़ाया, तो लगभग अड़तीस लाख से अधिक डिग्रियां बांटी होंगी.

यह ख्वाब एक दशक में पूरा कर दूंगा और इस सपना को साकार करने के लिए यूनिवर्सिटी बनाने की जरूरत नहीं है. आज सर सैयद से अधिक टेक्नोलॉजिस्ट की जरूरत है. सर सैयद ने जिस मिशन को शुरू किया, रफ्तार पकड़ाने के लिए वह जरूरी था.

उस रफ्तार को मैं परवाज देना चाहता हूं. आम लोगों तक उसे पहुंचाना चाहता हूं. मैं होटल खोलना नहीं चाहता हूं. ओयो की तरह एप लाना चाहता हूं. प्लेन खरीदना नहीं चाहता हूं, सीट पर काबिज होना चाहता हूं. टैक्सी खरीदना नहीं चाहता हूं,

ओला बनकर टैक्सी पर हावी होना चाहता हूं. शिक्षा के क्षेत्र में इसी तरह की सेवा का सपना का बुन रहा हूं. देश के हजारों विश्वविद्यालय-महाविद्यालयों में अपनी मांग और पहुंच से उन्हें भरने का दूसरा नाम है रोजमाइन. इस प्रक्रिया से एक नया सर सैयद का ख्वाब पूरा हो सकता.

मुल्क को इस वक्त सर सैयद की जरूरत है। नौजवानों को इस मिशन में जुड़कर कई सर सैयद पैदा करने की जरूरत है. आज मुसलमान कह रहा कि मेरे पास यह प्लान है, मगर कोई भी मुसलमान साथ मिलकर साथ चलकर कौम  और देश की सेवा नहीं करना चाहता.

शायद यही कारण है कि रोजमाइन के 40 में 37 ब्रांच मुस्लिम आबादी के पास नहीं है. दूसरी ओर जो आबादी तरक्की कर रही है, वह हर सफल योजना के साथ चल रही है.

यह देश का वह शिक्षा मंसूबा है, जो मुल्क को आगे ले जायेगा.रोजमाइन के 70 प्रतिशत अनुभवी परामर्शदाता हिन्दू हूं. यह सभी धर्म हिंदू, मुस्लिम, सिख ईसाई और खासकर देश की योजना है.

साभार: आवाज द वॉइस

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