अंतरराष्ट्रीय स्विमर शम्स आलम मैदान के बाहर लड़ रहे पैरा खिलाड़ियों की लड़ाई

मलिक असगर हाशमी / नई दिल्ली

पैरा खिलाड़ियों को खेल मैदान और जिंदगी के हरेक मोड़ पर तमाम तरह की चुनौतियां झेलनी पड़ती हैं. इससे इतर भी कई ऐसे मसले हैं,जिसके लिए वे निरंतर लड़ाई लड़ते रहे हैं. फिलहाल इस लड़ाई की अगुवाई का जिम्मा हाल में गुवहाटी में संपन्न 22 वें नेशनल पैरा स्विमिंग चैंपियन में दो गोल्ड एवं एक सिलवर पदक जीतने वाले मोहम्मद शम्स आलम के पास है.

वैसे, शम्स आलम को ज्यादा संघर्श अपने ही गृहप्रदेश बिहार में करना पड़ रहा है. वह मधुबनी ज़िले के हैं और पैरा खिलाड़ियों को सर्वाधिक परेशानी इसी सूबे में उठानी पड़ रही है. शम्स का आरोप है कि नीतीश सरकार सामान्य खिलाड़ियों की तरह पैरा खिलाड़ियों को सम्मान और सुविधा नहीं देती.

बिहार में पैरा खिलाड़ियों से भेद-भाव

हद यह कि इनाम राशि देने में भी बिहार में भेदभाव बरता जा रहा है. शम्स आलम इसको लेकर 2019 से लड़ाई लड़ रहे हैं. उन्होंने 6 दिसंबर 2019 को बिहार के तत्तकालीन मुख्य सचिव आमिर सुबहानी को पत्र लिखकर पैरा खिलाड़ियों की उपेक्षा की शिकायत की थी.

आमिर सुबहानी अभी भी बिहार के मुख्य सचिव हैं. शम्स का कहना है कि एशियन गेम्स में मेडल लाने पर उन्हें और सह खिलाड़ी अर्जना कुमारी को बिहार सरकार की ओर से प्रोत्साहन राशि के तौर पर मात्र 50,000 रुपये दिए गए थे.

जब कि 2017 में सरकार ने अंतरराष्ट्रीय पैरा खिलाड़ी शारदा कुमार को दो लाख रूपये का इनाम राशि दिया था. शम्स आलम का कहना है कि पुराने दस्तावेजों में पैरा खिलाड़ियों के अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन पर दो लाख देने का ऐलान बिहार सरकार के दस्तावेज में दर्ज है . मगर इस पर आज तक अमल नहीं किया गया है.

इसके अलावा वह 19 फरवरी 2021 को पटना के पाटलिपुत्रा स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में खेल नीति को लेकर हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में भी पैरा खिलाड़ियों से जुड़े सात बिंदुओं की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट कर चुके हैं.

इनमें केंद्र की नीति पर अमल करते हुए सूबे के सामान्य खिलाड़ियों की तरह पैरा खिलाड़ियों को महत्व देने, उनके बराबर प्राइज मनी उपलब्ध कराने, एशियन गेम्स 2022 की तैयारियों में लगे सूबे के खिलाड़ियों को सुविधा मुहैया कराने, प्राइमरी व मिडिल स्कूलों में स्पेशल बच्चों के लिए प्रोफेषनल पैरा कोच रखने, नौकरियों में पैरा खिलाड़ियों को तीन प्रतिशत आरक्षण देने, महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान की तर्ज पर बिहार में भी पैरा गेम्स की तरह पर्याप्त फंड मुहैया कराने, पैरा खिलाड़ियों की तरह जिला स्तर पर खेलो इंडिया यूथ गेम्स आयोजित करने और पैरा खिलाड़ियों को सेंसर लगे खले उपक्ररण उपलब्ध कराने का मुद्दा उठाया था.

अलग बात है कि बैठक हुए डेढ़ साल से अधिक समय बीत गए हैं, पर हुआ कुछ नहीं.

और भी दर्द है जमाने की सिवाय

पैरा खिलाड़ियों के लिए केवल बिहार में ही समस्या नहीं है. शम्स आलम आवाज द वॉयस को बताते हैं, स्पेशल खिलाड़ियों के लिए हर प्रदेशमें अलग-अलग तरह की समस्या है.

कई प्रदेश में पैरा खिलाड़ियों को कोई अहमियत नहीं दी जाती. इनको लेकर हर स्टेट में अलग-अलग पॉलिसी है. पैरा गेम्स और पैरा खिलाड़ियों को स्पांसरशिप तक नहीं मिलती. स्पोर्ट्स एथॉरिटी ऑफ इंडिया के स्टेडियम के अलावा पैरा खिलाड़ियों के लिए कहीं और प्रोफेशनल कोच नहीं है.

भारत के खिलाड़ी जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर कर रहे हैं तो उनके लिए प्रोफेशनल कोच का होना जरूरी है. शम्स कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जरूर पैरा खिलाड़ियों को अहमियत देते हैं, पर ऐसी सोच प्रदेश सरकारों को भी रखनी होगी.

मीडिया में भी महत्व नहीं मिलता. मध्य प्रदेश में जब भी कोई पैरा खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन करता है, वहां के मुख्यमंत्री, मंत्री, अधिकारी ट्विट कर हौसला अफजाई करते हैं, जबकि बिहार सहित अन्य प्रदेषों की सरकारें ऐसी नहीं करतीं.

शम्स आलम ने आवाज द वॉय से बातचीत में माना कि माहौल बदलने में समय लगेगा. इसके बावजूद इनका पैरा खिलाड़ियों को ‘अधिकार’ दिलाने की लड़ाई जारी रहेगी. वह इंटरनल ऑडिटर भी हैं. इस लिए टाटा सोशल साइंस जैसे बड़े संस्थानों मंे स्पेषल लोगों की सुविधाएं मुहैया कराने के लिए भी निरंतर प्रयास कर रहे हैं.

साभार: आवाज द वॉइस

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