जब शिक्षक ने की थी कलाम साहब के महान व्यक्ति बनने की भविष्यवाणी

राकेश चैरासिया / नई दिल्ली

मिसाइल मैन से मशहूर डाॅक्टर एपीजे अब्दुल कलाम हमेशा आत्मविश्वास से लबरेज रहे. निर्णय लेने में कभी देरी नहीं की. इसका बेहतर उदाहरण उनकी पुस्तक ‘विंग्स आॅफ फायर’ में मिलता है. उन्होंने चाय पीते-पीते कुछ ही क्षण में एक बड़ा फैसला ले लिया. उसके बाद जो कुछ किया आज भारत ही नहीं  दुनिया इसकी कायल है.

दुनिया में ज्यादातर साइंसदां नास्तिक या भगवान और भगवत्ता से जरा दूर का वास्ता रखने वाले हुए. किंतु वे ही वैज्ञानिक दुनिया को अपना सर्वोत्तम दे पाए, जिनकी विज्ञान के साथ अध्यात्म में अगाध श्रद्धा रही. जिसे दुनिया आज विज्ञान के नाम से जानती है, अध्यात्म उसका पुरखा है, क्योंकि वैज्ञानिकों ने जितने भी आविष्कार किए हैं, उनके अधिकांश गुह्यतम सिद्धांत और संकेत उन्हें अध्यात्म से ही प्राप्त हुए.

एपीजे अब्दुल कलाम साहब ऐसे ही एक आस्थावान विज्ञानी हुए, जिनका अकीदा इस बात में था कि रामेश्वरम के शिवालय में प्रार्थना या मस्जिद की नमाज का भाव सीधे ईश्वर तक पहुंचता है और तब आपका ब्रह्माण्ड की सर्वसत्ता से तादात्म्य हो जाता है.उन्हें भारत का ‘मिसाइल मैन’ कहा जाता है, लेकिन उनकी पूरी जीवन यात्रा ही उपलब्धियों से भरी हुई थी.

वे अपनी विकसित होती चेतना और गांभीर्य चरित्र के कारण अपनों और अपने शिक्षकों के हमेशा प्रियपात्र रहे और उन पर उनका सदैव आशीर्वाद रहा.यही कारण था कि अंतरिक्ष विज्ञान के पितृपुरुष प्रो. विक्रम साराभाई ने जब उनसे कहा कि क्या तुम राटो मोटर बना सकोगे? तो कलाम साहब ने क्षण भर की देरी किए बिना अपने आध्यात्मिक बल और अनुभव से तपाक से प्रत्युत्तर दिया, ‘हां, कर सकते हैं.’ ‘अग्नि की उड़ान’ में इस अद्भुत परिघटना के सूत्रपात का वर्णन मिलता है.

एमआइटी से प्रशिक्षु के तौर पर जब वे बंगलुरू के हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) पहुंचे, तो उनका वायुयानों के इंजनों की मरम्मत से वैज्ञानिक जीवन यात्रा शुरू हुई. वहां के हुनरमंदों के साथ पिस्टन इंजन और टरबाइन इंजन का काम सीखा.

एचएएल से वे वैमानिकी इंजीनियर बनकर निकले. एक साथ उन्होंने भारतीय वायुसेना और रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय (डीटीडी एंड पी) में आवेदन किया.वायुसेना के देहरादून में साक्षात्कार में वे एक क्रमांक से पीछे रहने पर थोड़े तनाव ग्रस्त हो गए.

गुरू ज्ञान

तब उनकी नियति उन्हें ऋषिकेष खींच ले गई, जहां शिवानंद आश्रम में उनका स्वामी शिवानंद से साक्षात्कार हुआ. बकौल कलाम, ‘बिल्कुल भगवान बुद्ध की तरह दिखने वाले.’ वे कहते हैं कि उनका मुस्लिम नाम जानकर भी स्वामी शिवानंद अविचिलित रहे.

यहां कलाम साहब को स्वामी शिवानंद से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुआ, ‘हृदय और अंतरात्मा से उत्पन्न इच्छा में विद्युत-चुंबकीय ऊर्जा निहित होती है. यही ऊर्जा रात्रि में सोते समय सुषुप्तावस्था में आकाश में चली जाती है और सुबह आंख खुलने पर यह ऊर्जा ब्रह्मांडीय चेतना लेकर वापस शरीर में प्रविष्ट होती है.’ इसलिए अपनी असफलता (वायुसेना का साक्षात्कार) को भूल जाओ और असमंजस से निकलकर अपने अस्तित्व के लिए सही उद्देश्य की तलाश करो.

यह गुरू-ज्ञान धारण किए जब कलाम वापस दिल्ली लौटे और देहरादून जाने से पहले, डीटीडी एंड पी में दिए गए अपने साक्षात्कार का परिणाम जानने पहुंचे, तो उन्हें नियुक्तिपत्र दे दिया गया.इसके बाद उन्होंने कानपुर इकाई में ‘डार्ट’ लक्ष्य का डिजायन बनाया और विमान उतरने के प्लेटफार्म को भी विकसित किया.

हॉवर क्राफ्ट और राकेट

फिर स्वदेशी हॉवर क्राफ्ट (मंडराने वाले विमान) का डिजायन तैयार किया. पहले हॉवर क्राफ्ट विमान को भगवान शंकर के वाहन ‘नंदी’ का नाम दिया गया. हालांकि इसकी सफलता पर कई लोगों ने शंका जताई, लेकिन उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन के साथ उसमें सफल उड़ान भरी. इसके बाद उनका हौसला बढ़ता गया.

फिर 1962 में केरल के त्रिवेंद्रम के पास थुंबा गांव में राकेट प्रक्षेपण केंद्र स्थापित हुआ. तब उन्हें राकेट प्रक्षेपण के तकनीकी प्रशिक्षण के लिए अमेरिका के ‘नासा’ संस्थान भेजा गया.जब वे नासा से लौटे, तो रोहिणी और मेनका नाम के दो भारतीय राकेटों का प्रक्षेपण किया गया.

राटो मोटर

विक्रस साराभाई ने 1968 में कलाम साहब को दिल्ली बुलाया. सुबह 3.30 बजे मिलने का समय था. इसलिए वे दिल्ली के अशोक होटल की लॉबी में बर्नार्ड शॉ की प्रबंधन पर लिखी एक किताब के साथ समय व्यवतीत करते रहे.

कलाम साहब के अनुसार, इस किताब की जो सबसेे अच्छी पंच लाइन स्मृति में सुरक्षित रही, वह यह थी कि कुछ विद्वान लोग दुनिया के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं और कुछ लोग दुनिया को अपने अनुरूप ढालने में जुट जाते हैं. दुनिया की सारी तरक्की इस दूसरे तरह के लोगों के कारण होती है, जो प्रयोगधर्मी और परिवर्तनधर्मी होते हैं.

लॉबी में एक अन्य चुंबकीय आकर्षण वाले व्यक्ति विराजमान थे. उन्हें जब विक्रम साराभाई ने मिलने को बुलाया, तो यह व्यक्ति भी उस समय मौजूद रहे, जिनका परिचय प्रो. साराभाई ने उनसे गु्रप कैप्टन वीएस नारायण के रूप में करवाया.

विक्रम सारा भाई ने कहा कि यदि वे रूस की बनी राटो मोटर ला दें, तो क्या आप 18 महीनों में अपने यहां तैयार कर सकते हैं.इस पर कलाम साहब और नारायणन ने कहा, ‘हां, कर सकते हैं.’विक्रम साराभाई तब उन्हें एक घंटे के सफर के बाद फरीदाबाद के तिलपत शूटिंग रेंज में लेकर गए, जहां उन्हें राटो मोटर दिखाई गई. राकेट असिस्टिड टेक ऑफ सिस्टम (राटो) मोटर का भारत में निर्माण सैन्य वैमानिकी इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ.राटो मोटर लगने के बाद फाइटर जेट छोटे रन-वे पर भी उड़ान भरने में सक्षम हो जाते हैं, क्योंकि राटो मोटरों से फाइटर को अतिरिक्त ताकत मिलती है.

इसके अलावा विमान कठिन और विपरीत परिस्थितियों में भी उड़ान भर पाता है. यह विलोम परिस्थियां इस प्रकार की हो सकती हैं कि जैसे बमबारी से हवाई पट्टी का खराब हो जाना, पहाड़ों या ऊंचे क्षेत्रों में बनी हवाई पट्टी, तापमान का कम-ज्यादा होना या विमान को अतिरिक्त भार उठाना आदि.

तब वायुसेना को अपने एस-22 और एचएफ-24 विमानों के लिए बड़ी संख्या में राटो मोटरों की जरूरत थी.कलाम साहब और नाराणयन ने राटो मोटरों का विकास शुरू का दिया. उन्होंने राटो मोटरों में कई फेरबदल भी किए कि जैसे उन्होंने फाइबर ग्लास मोटर का विकल्प चुना, जो भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप थी.

राटो मोटर की कामयाब रचना के बाद ही उन दोनों साहबान को रक्षा मंत्रालय के मिसाइल पैनल में सदस्य बनाया गया. यह पैनल तब कुछ दिनों पहले ही बनाया गया था.फिर यहां से शुरू हुई एक मिसाइल मैन की यात्रा. जब उन्होंने स्ट्रेटजिक और टेक्टिकल मिसाइलों पर अनुसंधान और विकास शुरू किया.

स्ट्रेटजिक मिसाइल वे होती हैं, जिनसे युद्ध की स्थिति में शहरों को निशाना बनाया जाता था. टेक्टिकल मिसाइल वे होती हैं, जिनसे जल, थल और नभ में लक्ष्यों को निशाना बनाकर युद्ध को प्रभावित किया जाता है. हालांकि मिसाइल प्रणाली में अब तक इतनी प्रगति हो चली है कि अब स्ट्रेटजिक और टेक्टिकल मिसाइल का अंतर मिट गया है.

उनके अनुभव ने बाद में एसएलवी उपग्रह प्रक्षेपण प्रणाली को भी धार दी और उनके योगदान को पूरा देश आज भी याद करता है.

गुरू की भविष्यवाणी

एक बार कलाम साहब की उनके गणित शिक्षक रामकृष्ण अय्यर ने गर्दन से पकड़कर बेंत से पिटाई की थी. कुछ समय बाद उन्हें परीक्षा में गणित में पूर्णांक मिले, तो शिक्षक अय्यर ने सुबह की प्रार्थना सभा में कहा कि “मैं जिसकी बेंत से पिटाई करता हूं, वह एक महान व्यक्ति बनता है. मेरे शब्द याद रखिए, यह छात्र विद्यालय और अपने शिक्षकों का गौरव बनने जा रहा है.”

और सचमुच, शिक्षक अय्यर की भविष्यवाणी सिद्ध हुई. अबुल पाकिर जैनुल आबेदीन अब्दुल कलाम की जयंती पर राष्ट्रवासियों की ओर से शत-शत नमन.

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