पूर्णिया के युवा पेश कर रहे हैं गंगा-जमुनी तहजीब की नई मिसाल

सुल्ताना परवीन / पूर्णिया

– दुर्गा पूजा हो या रामनौमी हर त्योहार में शामिल होते हैं मुसलमान

– असर हुआ ये कि हिन्दू भी शामिल होने लगे हैं ईद और मुहर्रम में

– हर साल हिन्दू-मुस्लिम एकता की नई मिसाल पेश कर रहा है पूर्णिया

बात 2018 की राम नवमी की है. पूरे बिहार में तनाव का माहौल था. पूर्णिया में राम नवमी के मौके पर विशाल जुलूस का आयोजन हुआ. उस तनाव के माहौल में पूर्णिया में निकाले गए जुलूस पर शहीद अब्दुल हमीद चौक पर लगातार कई घंटों तक मुसलमान युवकों ने पुष्प वर्षा की. इस मौके पर विहिप के संयोजक, राम नवमी शोभा यात्रा के संयोजक और श्रीराम सेवा संघ के संयोजक को रामायण भेंट की गई और केसरिया गमछा ओढ़ा कर स्वागत सम्मान किया गया. इसका सबसे अच्छा परिणाम 2019में मुहर्रम के दौरान दिखा. पहली बार मुहर्रम में सभी अखाड़ा प्रमुखों को हिन्दु संगठनों ने फूलों की माला पहना कर हरे रंग का गमछा ओढ़ा कर स्वागत किया था. उस समय पूर्णिया के लोगों ने देश के लिए नई मिसाल पेश की थी.

मिनी दार्जिलिंग के नाम से मशहूर पूर्णिया की जलवायू और यहां का माहौल दूसरी जगहों से जरा अलग है. यहां के लोग एक दूसरे पर इतने निर्भर हैं कि एक दूसरे के बिना चल नहीं सकते हैं.

करीब 22साल से तौफीक आलम और उनकी टीम शहर के माहौल को सोहार्दपूर्ण बनाने के लिए काम कर रही है. दशहरा हो, दिवाली हो, रामनवमी हो या अन्य कोई त्योहार, तौफीक आलम और उनकी टीम शांति बहाल करने के लिए काम कर रही है.

दुर्गा पूजा में बुर्कानशीं

तौफीक आलम इसके बारे में कहते हैं कि उनके चाचा स्व. जमशेद आलम से उनको समाज में मिल-जुलकर रहने की प्रेरणा मिली. दशकों से दुर्गा पूजा के मेले में और दूसरे समाराहों में मुस्लिम महिलाएं बुरका पहन कर बच्चों के साथ जाती रही हैं. पूजा के दौरान रजनी चौक के आस पास काफी भीड़ रहती है, क्योंकि गोकुल कृष्ण ठाकुरबाड़ी में बड़ा मेला लगता है.

बाइक की रखवाली

रजनी चौक के आसपास तौफीक आलम और उनकी टीम लोगों की सुरक्षा के अलावा लोगों की गाड़ियों की भी सुरक्षा करते हैं. अक्सर पूर्णिया में बाइक चोरी होती हैं, हर थाना इसका गवाह है. लेकिन पूजा के दौरान रजनी चौक के आसपास हजारों बाइक लगाई जाती हैं, लेकिन आज तक एक भी बाइक चोरी नहीं हुई है. और न ही किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार हुआ है. हिन्दु मुसलमान दोनों समुदाय के लोग पूजा के दौरान मेले का मजा लेते हैं. मेले के दौरान किसी शराबी को मेले के आसपास फटकने भी नहीं दिया. यहां तक कोई आदमी सिगरेट पीकर सड़क की तरफ धुआं नहीं फैंक सकता है.

जब हिंदू-मुस्लिम एक हो गए

तौफीक आलम कहते हैं कि 2002में रमजान का महीना था. 26जनवरी और सरस्वती पूजा एक ही साथ पड़ी थी. सरस्वती पूजा के दौरान भसान के दिन झंडा चौक पर लगे तिरंगे को किसी भसान में शामिल एक युवक ने गिरा दिया था. इस हादसे का हिन्दू और मुसलमान सबने मिल कर विरोध किया था और दोषी युवक को सजा दिलवाई थी.

हजारों लोगों का समर्थन

टीम में शहनवाज अख्तर, मंजर मजहर, सैफी अहमद, महताब आलम, खुशनसीब जैसे करीब 150युवक समाज में शांति और सोहार्द को मजबूत करने में अपना योगदान देते हैं. शहनवाज अकबर वैसे तो 2002से टीम के साथ हैं, लेकिन 2007से ज्यादा सक्रिय हैं. वो कहते हैं कि हम करने भर के लिए डेढ सौ हैं. हजारों लोगों का समर्थन हमें मिलता है. तभी तो हम लोग लगातार सफल होते आ रहे हैं.

दे रहे हैं अच्छा संदेश: राणा सिंह

तौफीक आलम और उसकी टीम के बारे में श्रीराम सेवा संस्थान के राणा सिंह कहते हैं कि पूर्णिया में गंगा-जमुनी तहजीब नहीं इंसानियत को ये लोग स्थापित कर रहे हैं. हिन्दुओं के हर आयोजन में शामिल होना, लोगों की मदद करना, ये वर्षों से ये कर रहे हैं. इनके टीम से समाज में बहुत अच्छा संदश जाता है. हमेशा यहां का माहौल अच्छा और सोहार्दपूर्ण बना रहता है. दूसरे लोग भी अब आगे आने लगे हैं. राणा सिंह कहते हैं कि सिर्फ पर्व त्योहर के मौके पर ही नहीं, बल्कि आम दिनों में श्रीराम सेवा संस्थान के हर कार्यक्रम में शामिल होते हैं.

ईद और मुहर्रम में सहयोग

पूर्णिया जिला साइकिल एसोसिएशन के सचिव विजय शंकर सिंह कहते हैं कि तौफीक आलम और उनकी टीम की सोच बहुत अच्छी है. ये लोग इंसानियत की मिसाल हैं. हमेशा दूसरे इंसानों के बारे में सोचते हैं. हर पर्व त्योहार में उनकी खड़ी रहती है. राम नवमी की जुलूस में शामिल लोगों के लिए शरबत लेकर आ जाते हैं, होली में मिठाई लेकर शामिल हो जाते हैं. इससे समाज को नई ऊर्जा मिलती है. इसका असर ये है कि हम लोग ईद और बकरीद में उनके घर जाते हैं और उनके त्योहार में शामिल होते हैं. हर साल यहां पर भाईचारा और आपसी प्रेम का नया अध्याय जुड़ रहा है.

साभार: आवाज द वॉइस

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