संसद में महिला प्रतिनिधित्व की बात करें, तो भारत पाकिस्तान से भी पीछे है!

कृष्णकांत

सशक्तिकरण का अर्थ है ​सत्ता, संपत्ति, और समाज में भागीदारी। पंजाब सरकार ने सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा की है। ये महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन क्या कांग्रेस या भाजपा लोकसभा और राज्यसभा में भी महिला प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर ईमानदारी दिखाएंगी?

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का मसला 45 साल से लटका है। 1974 में पहली बार महिलाओं की स्थिति के आकलन संबंधी एक समिति की रिपोर्ट में ये बात उठाई गई थी कि राजनीति में महिला भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

1996 में पहली बार देवगौड़ा सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया, लेकिन इसका भारी विरोध हुआ। उस समय इसका विरोध करते हुए शरद यादव ने कहा था कि इस विधेयक से सिर्फ ‘परकटी महिलाओं’ को ही फायदा पहुंचेगा। संसद में बिल को लेकर लात घूंसे चले और बिल फाड़ दिया गया।

1998 में वाजपेयी सरकार ने विधेयक पेश किया लेकिन भारी विरोध के बीच यह लैप्स हो गया। इसके बाद 1999, 2002 तथा 2003 में इसे फिर लाया गया, लेकिन नतीजा वही रहा। विधेयक पास नहीं हो सका।

2008 में मनमोहन सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण से जुड़ा 108वां संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में पेश किया। दो साल बाद 2010 में तमाम विरोधों को दरकिनार कर राज्यसभा में ये विधेयक पास हो गया लेकिन लोकसभा में पास नहीं हो सका।

पंचायतों में महिला आरक्षण 1993 से ही लागू है। क्या राज्यसभा से पास होकर लोकसभा में लटके महिला आरक्षण विधेयक को पास किया जाएगा?

संसद के हर सत्र में ये मुद्दा उठता जरूर है, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ती। विश्लेषकों की मानें तो कोई भी राजनीतिक दल इसे पास नहीं होने देना चाहता।

अगर संसद में महिला प्रतिनिधित्व की बात करें, तो भारत इस मामले में पाकिस्तान से भी पीछे है।

चुनाव आता है तो भी इसकी चर्चा सब करते हैं, लेकिन कोई ईमानदार पहलकदमी कहीं नहीं दिखती, वरना जबरन विधेयक पास कराने का रिकॉर्ड बनाने वाली भाजपा सरकार इसे भी पास करा ही लेती।

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