रिक्शा चालक अहमद अली ने गांव में स्कूल खोल ने को सब कुछ दान कर दिया

सतानंद भट्टाचार्य/ हैलाकांडी (असम)

अहमद अली बेशक गरीबी की वजह से अपनी पढ़ाई नहीं कर पाए लेकिन उन्हें पूरा भरोसा है कि वह अपने लोगों को ‘निरक्षरता’ नामक पाप से मुक्ति दिला सकते हैं.दक्षिणी असम के करीमगंज जिले के पाथेरकंडी सर्कल के खिलोरबोंड-मधुरबोंड के 85 साल अहमद अली आजीविका के लिए रिक्शा चलाते हैं, लेकिन उनकी दृढ़ता देखते ही बनती है. अली ने नौ स्कूलों की स्थापना के लिए अपना सब कुछ दान कर दिया है. इस दान में उनकी रिक्शा चलाकर होने वाली आमदनी और 32 बीघे की पैतृक भूमि भी शामिल है. इन नौ स्कूलों में अब लगभग 500 लड़कियां और 100 लड़के पढ़ाई कर रहे हैं.

अली ने पहली बार 1978 में ग्रामीणों से एक छोटी सी रकम जुटाकर और जमीन का एक टुकड़ा बेचकर एक प्राथमिक विद्यालय की स्थापना की थी. उसके बाद से बच्चों को तालीम दिलवाना उनकी मुहिम बन गई है.

मिसाल-बेमिसालः 

अहमद अली ने रिक्शे की अपनी सारी कमाई और अपने 32 बीघे खेत शिक्षा के मद में दान दे दिए. प्रधानमंत्री ने उनके काम की सराहना की है.

खिलोरबोंड-मधुरबोंड और उसके आसपास के इलाकों में उन्होंने नौ स्कूलों की स्थापना की, जिनमें से तीन लोअर प्राइमरी, पांच माध्यमिक अंग्रेजी स्कूल और एक हाइस्कूल है. इनमें से पांच स्कूलों को अब प्रांतीय कर दिया गया है. यानी इन पांच स्कूलों के कर्मचारियों को सरकार से वेतन मिलता है. बाकी स्कलों में शिक्षक स्वैच्छिक काम करते हैं.

85 साल की उम्र में, वह अभी भी अपने गांव के आसपास एक जूनियर कॉलेज खोलने के अपने सपने को पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं ताकि उनके स्थापित स्कूलों से मैट्रिक पास होकर निकले बच्चे उच्च शिक्षा हासिल कर सकें.

कई पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत अली अभी भी खुद को ‘रिक्शा-चालक’ कहलाना ही पसंद करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि हर पेशे की अपनी गरिमा होती है.

यह विनम्र बुजुर्गवार खुद को “अनपढ़ होने के कारण एक शापित प्राणी” मानते हैं. आवाज- द वॉयस से बातचीत में वह कहते हैं, “ऊपरवाले के मार्गदर्शन और दुआ के साथ, मैं आने वाली पीढ़ियों के जीवन को बदलने के मिशन पर हूं. मुझे खुशी है कि मैं अपने गांवों के बाकी बच्चों के साथ-साथ अपने बच्चों को भी तालीम दे सका. स्कूलों के कुछ पास-आउट अब अच्छी तरह से नौकरी करके जीवनयापन कर रहे हैं. इससे मुझे बहुत संतोष मिलता है.”

अली के दो विवाहों से 11 बच्चे हैं और उनमें से एक, खुद उसके ही नाम पर स्थापित हाइस्कूल में काम करते हैं. हालांकि, वह कभी नहीं चाहते थे कि उनकी संतान उनके ही नाम पर स्थापित स्कूल में काम करे लेकिन ग्रामीणों के आग्रह पर हाइस्कूल का नाम अहमद अली हाइस्कूल रखा गया था.

कई पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत अली अभी भी खुद को ‘रिक्शा-चालक’ कहलाना ही पसंद करते हैं क्योंकि उनका मानना है कि हर पेशे की अपनी गरिमा होती है. यहां तक कि मार्च, 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साप्ताहिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में भी उनका उल्लेख किया गया था. अली कहते हैं,”पीएम की आवाज में अपना नाम सुनकर मैं अवाक रह गया.” प्रधानमंत्री मोदी ने उनका नाम लिया था और उनके पहल की प्रशंसा की और कहा कि उनके परोपकार को मान्यता दी जानी चाहिए.

अली की परोपकारिता को कुछ साल पहले तत्कालीन पाथेरकांडी विधायक कृष्णेंदु पॉल सामने लाए थे. अली को एक ‘दुर्लभ व्यक्तित्व’ करार देते हुए उन्होंने अहमद अली हाइस्कूल के विकास के लिए केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के तहत अपने बहु-क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम कोष से 11 लाख रुपये की राशि का योगदान दिया था.

समाज ऐसे ही बेमिसाल शख्सियतों से बनता है, जिनके लिए ‘अपनों’का दायरा परिवार से बढ़कर बेहद बड़ा और व्यापक होता है.

साभार: आवाज दी वॉइस

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