मायावती में न तो अंबेडकर वाली वैचारिक दृढ़ता और नहीं कांशीराम जैसी साफगोई

कृष्ण कांत

बसपा जैसी एक जुझारू पार्टी को क्या हो गया? यूपी की राजनीति बदल देने वाली और करोड़ों लोगों के मन में न्याय और बदलाव की आस जगाने वाली ये वही पार्टी है, जो एक चुनी हुई सरकार गिराकर नई सरकार बनाने में खुलकर सहयोग करने पर उतर आई.

कुछ महीने पहले मायावती के भाई के घर आयकर विभाग का छापा पड़ा था और 400 करोड़ की सं​पत्ति जब्त की गई थी. उसके बाद बसपा सुप्रीमो सिर्फ औपचारिक ​ट्वीट करती हैं. इतना तो तय है कि बसपा अब एक ऐसी कठपुतली बन गई है, जिसकी डोर आईटी, ईडी और सीबीआई के हाथों में है.

बसपा ने कल जब राजस्थान के छह विधायकों को व्हिप जारी किया, तभी यह साफ था कि ये सिर्फ दबाव की राजनीति ​है, क्योंकि बसपा के सभी छह विधायक पिछले साल ही कांग्रेस में शामिल हो गए थे और स्पीकर ने इस विलय को मंजूरी दे दी थी.

विधायकों के कांग्रेस में जाने में कोई कानूनी अड़चन नहीं थी, क्योंकि पार्टी के सभी विधायक चले गए तो उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा. फिर इस व्हिप का क्या मतलब था?

यह भी ध्यान देने की बात है कि बसपा ने तब कोई कार्रवाई नहीं की, जब ये विधायक कांग्रेस में गए. उसने ऐसे समय में व्हिप जारी किया, जब राजस्थान में गहलोत सरकार गिराने की साजिशें रचे जाने का आरोप लग रहा है.

भाजपा विधायक मदन दिलावर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करके बसपा विधायकों के कांग्रेस में विलय को चुनौती दी. बसपा भी इस मामले में पक्षकार बनने पहुंची थी, लेकिन कोर्ट ने दोनों की याचिकाएं खारिज कर दीं.

इस मामले में यही होना था, यह पहले से तय था. फिर बसपा ने ऐसा क्यों किया? शायद बसपा पर अपनी वफादारी साबित करने का दबाव रहा हो!

बसपा प्रमुख मायावती ऊपरी तौर पर सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करती रहती हैं, लेकिन वह दिखावा है. जहां जब भाजपा को जरूरत पड़ी है, बसपा ने खुलकर साथ दिया है. यूपी में पहली बार बसपा और भाजपा की गठबंधन सरकार बनी तो सीएम मायावती ने ज्यादातर अहम विभाग भाजपा को दिए थे.

जब 2002 के गुजरात दंगे के बाद विधानसभा चुनाव हुआ तो मायावती ने गुजरात जाकर भाजपा के पक्ष में प्रचार किया था. पिछले छह साल में सबसे ज्यादा चर्चा दलितों और मुसलमानों के उत्पीड़न को लेकर रही. मायावती ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया कि भाजपा को कोई अ​सुविधा महसूस हुई हो.

आज की मायावती अपनी पार्टी के साथ जैसी दिख रही हैं, वे वैसी लाचारी के लिए नहीं जानी जातीं. विचारक और जुझारू नेता की छवि वाले कांशीराम के साथ जो मायावती थीं, वे लाचार नहीं, हर चुनौती का सामना करने के लिए कमर कसकर खड़ी थीं. लेकिन आज की मायावती में न तो डॉक्टर अंबेडकर वाली वैचारिक दृढ़ता है, जो सामंती सवर्ण समाज की चूलें हिला दे, न ही उनमें कांशीराम की तरह वह साफगोई है, जो अपने आदर्शों से समझौता न करे.

मायावती और बसपा ने आज फिर से ये संदेश दिया है कि जिस राज्य में भाजपा हार कर भी सरकार बनाने की कोशिश करेगी, उसकी घोड़ा खरीद राजनीति बसपा उसके साथ खड़ी होगी.

चिंता की बात ये है कि सिर्फ बसपा ही नहीं, अपवाद छोड़कर सभी क्षेत्रीय क्षत्रप अब एक पार्टी के क्षेत्रीय एजेंट की भूमिका में आ गए हैं.

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