कोरोना: पश्चिमी मीडिया का भारत विरोधी चेहरा

शुजाअत अली क़ादरी

भारत में कोरोना संकट के दौरान विदेशी मीडिया ख़ासकर ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ ने जमकर भारत के विरुद्ध प्रचार किया। इस स्थिति में भारत के प्रयासों को धक्का लगाकर सरकार की बदनामी करना एक मक़सद हो सकता है। यह भी संभव है कि यह मीडिया नरेन्द्र मोदी सरकार का विरोधी हो। इसमें कोई आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक महामारी के दौरान लोगों में भय और अनिश्चितता का माहौल पैदा करना निन्दनीय है। भारत की छवि पर इससे असर पड़ा है लेकिन इस मीडिया पर भरोसा करके देसी ऑडियंस के विश्वास को जो ठेस पहुँची है, उसने अविश्वास तो बढ़ाया ही है, अवसाद को भी जगह दी है।

वॉशिंगटन पोस्ट के लेखक अंतोनिया नूरी फ़रज़ान ने भारत में मदद के नाम पर एक आलेख में कहाकि भारत में कोरोना के रोज़ाना 3 लाख नए मरीज़ आ रहे हैं। चूँकि भारत का स्वास्थ्य निज़ाम ‘दबाव में फंस’ गया है इसलिए आप यूनिसेफ़, द इंडियन रेड क्रॉस, रेपिड रेस्पॉन्स, अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ़ फ़ीज़िशियंस ऑफ़ इंडियन ऑरिजिन, होप फ़ाउंडेशन और ऑक्सफ़ैम इंडिया की मदद कीजिए ताकि वह भारत की मदद कर पाएं। ज़ाहिर है इसमें कई विदेशी एनजीओ हैं और भारत में लम्बे समय से काम कर रहे हैं। भारत में मेडिकल क्षेत्र में मदद करने वाले न भारतीय मूल के एनजीओ के नाम वॉशिंगटन पोस्ट ने इंगित किए, ना ही वह भारत सरकार के प्रधानमंत्री राहत कोष, स्वास्थ्य मंत्रालय या प्रधानमंत्री केयर फंड को इस लायक़ समझता है। यह भारत पर दबाव बनाने की कोशिश भी है कि वह विदेशी एनजीओ के प्रति नरमी का भाव रखे, उनके विदेशी मदद के लिए द्वार खोले और दान के प्रति दया का भाव रखने वाले आम अमेरिकी या वॉशिंगटन पोस्ट के पाठक एनजीओ पर यक़ीन करें, भारत सरकार के प्रबंधन पर नहीं। अमेरिकी मूल की लेखिका अंतोनियो नूरी फ़रज़ान कभी भारत नहीं आई होगी लेकिन वह ‘आर्म चेयर जर्नलिज़्म’ के भरोसे भारत की स्थिति की व्याखया कर रही है। समाचार की राजनीति को इस तरह समझना हमारी ज़िम्मेदारी है।

वॉशिंगटन पोस्ट ने 12 अप्रैल 2021 की रायपुर, छत्तीसगढ़ की तस्वीरों के साथ एक चित्र आलेख का प्रकाशन किया। इस आलेख में वॉशिंगटन पोस्ट की मंशा यह दिखाने की रही कि अस्पताल मरीजों से भर गए हैं और लोग लाशों के अंतिम संस्कार के लिए भी इंतज़ार रहे हैं। शमशान घाट की सामान्य स्थिति की तस्वीरों के साथ भी इस अख़बार ने सनसनी पैदा करने की कोशिश की जबकि आमतौर पर भारत के हर शहर में सामान्य मृत्यु दर के हिसाब से लोग शव लेकर शमशान घाट पहुँच रहे थे। चूंकि कोरोना के कारण शमशान घाटों में भी सहायकों की कमी हो रही थी, इस स्थिति को ‘शवों के इंतज़ार’ के रूप में प्रचारित कर इस अख़बार ने भारत क विरोध में प्रचारित करने की कोशिश की।

अपने प्रयास से जब भारत कोरोना वायरस के प्रकोप से निकल पाने में सक्षम हो गया तो 18 मई को इसी अख़बार ने एक ख़बर में यह कहाकि भारत में अब वैक्सीन की कमी हो गई है और उसका वैक्सीन सिस्टम लड़खड़ा रहा है। ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ ने कोरोना के बहाने भारत के विरुद्ध कवरेज की झड़ी लगा दी। ऐसा लगने लगा कि दुनिया में अगर कहीं सबसे भयानक हालात हैं तो भारत में हैं। ‘द वॉशिंटन पोस्ट’ की हैडलाइन से ही आप अंदाज़ा लगा लेंगे कि उसका भारत विरोधी एजेंडा कितना प्रभावी है।

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अमेरिका में अब भी दुनिया के सबसे ज़्यादा कोरोना मरीज़ हैं। दुनिया के लगभग 16.40 करोड़ कोरोना पॉज़ीटिव मरीज़ों में लगभग 3.31 करोड़ संक्रमित और 5.87 लाख मौतों के साथ अमेरिका अब भी एक नम्बर पर बना हुआ है, जबकि भारत में कुल संक्रमितों की संख्या 2.55 करोड़ और मृत्यु 2.83 लाख ही है। इसके बावजूद अमेरिकी मीडिया ख़ासकर वॉशिंगटन पोस्ट ने लगातार नकारात्मक रिपोर्टिंग करके भारत की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया है। भारत में 8 मई को संक्रमितों की अब तक की सबसे अधिक संख्या 4.03 की आई थी जो 18 मई को घटकर प्रतिदिन 2.67 लाख रह गई जबकि अमेरिका में इस साल 8 जनवरी को ही 3 लाख नए संक्रमित मिले थे। इससे एक दिन पहले यानी 7 जनवरी 2021 को भारत में 18 हज़ार 139 ही नए संक्रमित मिले थे। जब दुनिया की महाशक्ति कोरोना से थर्रा रही थी, भारत इस पर लगभग विजय पा चुका था। बताने की आवश्यकता नहीं कि अमेरिका की जनसंख्या 32.82 करोड़ है जबकि भारत की जनसंखा 136.64 करोड़ है। वाशिंगटन पोस्ट को अमेरिकी वायरस और संकट पर इस तरह की हैडलाइन के साथ नहीं देखा जा रहा। यह पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है और एजेंडा जर्नलिज्म का खुला उदाहरण है।

(लेखक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में पीएचडी हैं, उन्हें स्वतंत्र पत्रकारिता और सामुदायिक सेवा का लंबा अनुभव है। लेखन के साथ उनकी रुचि मानवता, विनम्रता, सह अस्तित्व, बहुलवाद और सूफीवाद के प्रसार में है।)

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