‘जब लोग बना रहे थे अपनों से भी दूरी, आरिफ खान 200 जिंदगियां बचा कर दुनिया से चले गए’

कृष्णकांत

आरिफ खान 200 जिंदगियां बचा कर इस दुनिया से चले गए। ऐसे वक्त में जब सही सलामत लोग भी एक दूसरे से दूरी बनाए हुए थे, आरिफ खान लोगों को अस्पताल पहुंचा रहे थे। ऐसे वक्त में जब कई बार अपना परिवार ही कोरोना मृतक की लाश लेने से मना कर देता है, आरिफ खान ने 100 से ज्यादा हिंदुओं को श्मशान पहुंचा कर उनका अंतिम संस्कार किया था।

एक दुनिया वो है जहां महामारी भी हिंदू-मुसलमान हो जाती है, एक दुनिया आरिफ खान जैसे लोगों की है जो जाति-धरम को ताक पर रखकर इंसानियत की सेवा करती है और अपनी जान तक दे देती है।

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी को भारत में जब एक मजहब से जोड़ा जा रहा था, आरिफ खान तब भी मरीजों को अस्पताल पहुंचा रहे थे। जब कोरोना वारियर्स के लिए तालियां बज रही थीं, तब भी आरिफ खान ने कुछ लोगों की जान बचाई थी। अब जब कोरोना की चर्चा तक बंद हो चुकी है, आरिफ खान अपना फर्ज निभाकर इस जहान-ए-फानी से कूच कर गए हैं।

मैं उन्हें नहीं जानता, लेकिन सुना है कि वे 25 साल से शहीद भगत सिंह सेवा दल के साथ जुड़े थे। वे मुफ्त में एम्बुलेंस की सेवा मुहैया कराने का काम करते थे। कोरोना आने के बाद, 21 मार्च से ही आरिफ संक्रमित मरीजों को लाने-ले जाने का काम कर रहे थे। भगत सिंह के नाम पर बने संगठन से जुड़े आरिफ ने भगत सिंह की तरह ही अपनी जान भी दांव पर लगा दी।

आरिफ खान के जानने वाले बताते हैं कि जिंदादिल इंसान थे। हरदम मुस्कुराते रहते थे। बेहद सादे और ईमानदार थे। दिल्‍ली के सीलमपुर इलाके में रहते थे। वही इलाका जहां लॉकडाउन के ठीक पहले बस्तियां जलाई गई थीं।

शैतान खून बहाते रहते हैं, लेकिन इंसानियत अपना धर्म नहीं छोड़ती। वह अपने रास्ते चलती रहती है। उसका नाम कभी आरिफ हो सकता है, कभी आनंद, कभी आदम।।। इससे क्या फर्क पड़ता है?

शहीद भगत सिंह सेवा दल के संस्थापक जितेंद्र सिंह शंटी के मुताबिक, आरिफ कोरोना काल में दिन रात काम किया। वे मरीजों के लिए 24 घंटे उपलब्ध रहे। रात को 2 बजे भी मरीजों को अस्पताल पहुंचाया। अगर किसी मरीज का फोन आ जाए तो आरिफ खान अपना सब काम छोड़कर तुरंत चल देते थे। वे करीब साढ़े छह महीने से अपने घर भी नहीं गए थे।  एंबुलेंस की पार्किंग में ही रहते थे, क्योंकि घर जाने पर परिवार को भी खतरा होता। उन्होंने करीब 200 लोगों को अस्पताल पहुंचाया और करीब 100 लोगों का अंतिम संस्कार किया।

6 अक्टूबर को आरिफ खान को कोरोना संक्रमण हो गया था। कल अस्पताल में उनकी मौत हो गई।

इस दुनिया में बुराइयां बहुत तेजी से फैलती हैं। अच्छाइयों को फैलने नहीं दिया जाता। लेकिन आरिफ जैसे इंसान अच्छाइयों को जिंदा रखते हैं। आरिफ खान इंसानियत के फ्लैग बियरर थे। इंसानियत के ऐसे ही तमाम योद्धाओं की वजह से ये दुनिया खूबसूरत है।

आरिफ खान भाई को मेरा सलाम पहुंचे! ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे!

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