दंगे की दहशत से आगे निकलता भागलपुर का एक गांव, जिसने 60 जानें खोई थीं

राजीव / भागलपुर

उस घटना को 32 साल गुजर गए हैं पर घाव हरे ही हैं. बेशक, बदलाव की बयार है और समां बदल रहा है लेकिन अतीत की छाया इतनी दहशतनाक है कि कोई भी इसको दोहराना नहीं चाहता.

आज से 32 साल पहले यानी शुक्रवार 27 अक्टूबर, 1989 का दिन बिहार में भागलपुर जिले के सबौर प्रखंड के चंदेरी गांव के बाशिंदे मुस्लिम परिवारों पर कहर बनकर टूटा था. एक ही गांव में 60 लोगों की हत्याएं कर दी गई थी. तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि दो समुदायों के बीच दरक गए रिश्तों में फिर से जुड़ाव पैदा हो पाएगा.

लेकिन आज लोग दंगे का नाम लेते ही सिहर जाते हैं. अधिकांश लोग मानते हैं कि दंगा समाज को खंडित करता है और कोई भी उन पलों को यादों में भी दोहराना नहीं चाहता.

आखिर, 32 सालों में क्या गुजरा है इस गांव में और सोच में कितना बदलाव आया है? सबौर के पास हावड़ा-पटना रेल लाइन पार करते ही चंदेरी गांव शुरू हो जाता है. गांव के मुहाने पर चंदेरी प्राथमिक विद्यालय में बच्चों को पढ़ाते हुए मौलवी साहब पड़ोस के गांव राजपुर के है.

1989 में सांप्रदायिक दंगों के बाद यहां के कई परिवार पलायन करके राजपुर जा बसे थे. मुस्लिमों में से दो-चार परिवार ही अब भी चंदेरी गांव में रह रहे हैं. दंगों के बाद कई परिवारों ने हबीबपुर, बरहपुरा, शहजंगी जैसे मुस्लिम मुहल्लों में घर बना लिया है. लेकिन बदलाव की बयार की बात करने वालों की कमी नही है.

चंदेरी गांव में रह रहे मोहम्मद सिराजुद्दीन कहते हैं, “समय बदल गया है और लोग उन दिनों को भूल चुके हैं.लेकिन तीन दशक के बाद भी खौफ है कि दिल से निकलता नहीं है. बेशक परिस्थितियां बदली है, लोग रोजी-रोजगार के चक्कर में पलायन भी कर रहे हैं. मगर जिन्होंने उस सच को भोगा है, उनके जेहन से जख्म की टीस को निकालना बेहद मुश्किल है.”

सिराजुद्दीन कहते हैं कि हमें बीते हुए वक्त से सबक सीखना चाहिए.

चंदेरी की रहने वाली मल्लिका बेगम के दाहिने पैर को दंगाइयों ने काट डाला था. दंगों के बाद राहत के तहत तत्कालीन कलक्टर ने उन्हें समाहरणालय में फाइल ढोने का काम दिया था. लेकिन मल्लिका पढ़ी-लिखी नहीं थीं ऐसे में उनको काम से हटा दिया.

इतना ही नहीं, मल्लिका बेगम की परिस्थितियों को देखकर जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले का रहने वाले एक फौजी ने मल्लिका से शादी की थी और उसे उस दौरान काफी सुर्खियां भी हासिल हुई थीं लेकिन उस फौजी ने मल्लिका को छोड़ दिया है और कश्मीर में ही उसने दूसरी शादी कर ली है. अब मल्लिका अपने दो बच्चों का पालन-पोषण अकेली ही कर रही है.

मल्लिका बेगम कहती हैं, “दंगे का खौफ अब दिलोदिमाग में नहीं है.बल्कि समाज में अब उस तरह की स्थितियां भी नहीं है. अब लोगों की सोच और संस्कार में अंतर आया है.”

मल्लिका कहती है कि हिंसा को बढ़ावा देने वाले ज्यादातर लोग अशिक्षा का शिकार होते हैं. वह कहती हैं, “मैं मानती हूं कि समाज का मजबूत तभी होगा, जब सबकी सोच एक जैसी होगी. अशिक्षा और अभाव के कारण समाज में दूरियां कायम होती है, लोग एक-दूसरे से दूरी बनाते हैं.”

ऐसे ही एक शख्स हैं प्रवीर राय. इस कलाकार ने हर्ष मंदर की संस्था अमन बिरादरी के बैनर तले भागलपुर दंगों पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री ‘एक और सच’ का निर्माण किया था. राय कहते हैं, “जिन परिस्थितियों में दंगा होता है, उसके बाद लोग उस इतिहास को तो नहीं दुहराते हैं, लेकिन आने वाली पीढ़ियां उस घटनाक्रम से बहुत कुछ सीखना भी नहीं चाहती है.”

प्रवीर बताते हैं कि जब वे लोग चंदेरी में काम कर रहे थे तो टाटा कंपनी ने वहां पर पुनर्वास के काम के लिए 35मकान बनवाए थे. लेकिन खौफ की वजह से लोगों ने टाटा के बनाए घरों को छोड़ दिया है और कहीं और जाकर रहने लगे हैं.

बेशक 32 साल बीत गए हैं लेकिन दंगे के दाग कायम हैं. समाज में और परिस्थितियों में काफी कुछ बदला जरूर है लेकिन लोगों में जिस तरह की समझ पैदा हुई है उम्मीद वहीं से पैदा होती है. चंदेरी में एक दुकानदार कमल कुमार दास कहते हैं, “दंगे-फसाद से शहर का विकास रुक जाता है और समाज की गति पीछे की ओर हो जाती है.”

लेकिन, जिस तरह से लोगों की सोच में परिवर्तन आया है वैसे में अगर समाज की गाड़ी के दोनों समुदायों वाले पहिए एक ताल में चलें तो इस गति को आगे और तेज भी किया जा सकता है.

Source: Awaz The Voice

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