डॉ ग़ुलाम मोहिउद्दीन, महामारी कोविड-19 में चीन से भारत लौटे थे और अब भारत में ही OLED तकनीक में शोध करेंगे

कोविड-19 एक ऐसी महामारी जिसका नाम सुनते ही पूरी दुनिया में एक दहशत सी होती है इस महामारी ने सिर्फ भारत की नहीं बल्कि पूरी दुनिया क लोगों की आजीविका को बाधित कर दिया है तम्माम लोगो को बहुत कष्ट झेलने पे मजबूर किया है बहुतों को तो अपनी तक गवानी पड़ी और बहुत से लोगो को अपने रोज़गार काम धंदे से भी हाथ धोना पड़ा,

विदेशो में कार्यरत कई लोगों को नौकरी छोड़ कर घर वापस आने पर मजबूर कर दिया वहीँ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के डॉ. गुलाम मोहिउद्दीन, एक ऐसे युवक थे जिन्हें विदेश में अपने स्थापित करियर के आधे समय के बाद स्वदेश लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा.

डॉ मोहिउद्दीन हाल ही में ब्रिटेन में अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान फैलोशिप प्राप्त करने वाले देश के कुछ प्रतिभाशाली शोधकर्ताओं में से एक बन गए हैं. और वह वर्तमान में रसायन विज्ञान विभाग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेघालय (USTM), रिवी जिला, असम-मेघालय सीमा, भारत में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. ASRB को वर्ष 2022-2023 के लिए अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान अनुभव फैलोशिप से सम्मानित किया गया है. इस फ़ेलोशिप के तहत डॉ मोहिउद्दीन को डंकन डब्ल्यू ब्रूस, रसायन विज्ञान के फेलो प्रोफेसर, रॉयल सोसाइटी ऑफ यॉर्क यूनिवर्सिटी, ग्रेट ब्रिटेन के साथ काम करने का सुनेहरा अवसर मिलेगा,

वह कहते हैं ये अवसर मेरे करियर को और शानदार बनाएगा जबकि ये एक अल्पकालिक फेलोशिप है, यह योजना भारत सर्कार द्वारा लागु की गयी एक बेहतरीन योजना है इसके तहत काम को एक नयी दिशा मिलेगी, यह प्रोजेक्ट इस साल अगस्त में शुरू भी होना है, डॉ मोहिउद्दीन को बायो-लाइट एमिशन इक्विपमेंट (ओएलईडी) के लिए सामग्री विकसित करने के उद्देश्य से परियोजना में छह महीने के लिए शोध करने के लिए मानद फैलोशिप के लिए चुना गया है, उम्मीद की जाती है के OLED तकनीक भविष्य में LED तकनीक की जगह लेगा,

डॉ मोहिउद्दीन कहते हैं के सर्कार ने फेलोशिप के लिए विज्ञापन दिया और चीन से लौटने के बाद पिछले साल सितंबर में यूएसटीएम में शामिल था तभी मैंने इसके लिए आवेदन किया और इसी के तहत मुझे मानद फेलोशिप के लिए चुना गया था. यह फेलोशिप केवल उन भारतीय शोधकर्ताओं को प्रदान की जाती है जिन्होंने किसी भारतीय विश्वविद्यालय से पीएचडी की है हालाँकि 40 वर्ष से कम आयु के युवा शोधकर्ताओं को फेलोशिप की पेशकश की जाती है.

2014 में असम विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त करने के बाद, डॉ मोहिउद्दीन भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, मोहाली में पोस्ट डॉक्टरल फेलो के रूप में शामिल हुए. फिर उन्होंने 2019 में चीन के जियान शियाओतोंग विश्वविद्यालय में उसी डिग्री में काम करना शुरू किया.

वह बताते हैं के वहां उनके करियर ने सही दिशा में उड़ान भरी थी, लेकिन कोविड-19 को मद्देनज़र रखते हुए उन्हें भारत वापस लौटने पर मजबूर कर दिया उन्होंने अपने वर्तमान करियर के बारे में बात करते हुए कहा के वह हाल में गुवाहाटी के पास एक निजी विश्वविद्यालय यूएसटीएम में कार्यरत हैं, और वहां के अनुभव से काफी खुश हैं वह कहते हैं के मैं इस विश्वविद्यालय में काम करके बहुत खुश हूं. यह एक नया विश्वविद्यालय है,

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